वॉशिंगटन/तेहरान: मिडल ईस्ट में जारी संघर्ष अब एक ऐसे मोड़ पर खड़ा हो गया है जहाँ से वापसी का रास्ता खतरनाक नजर आ रहा है। एक तरफ राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान के साथ संभावित डील की चर्चा कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ पर्दे के पीछे अमेरिकी सेना की सबसे घातक टुकड़ी 82nd एयरबोर्न डिवीजन को मोर्चे पर उतारने की तैयारी पूरी कर ली गई है। सूत्रों के मुताबिक पेंटागन जल्द ही फोर्ट ब्रैग, नॉर्थ कैरोलिना से करीब 3,000 से 4,000 जांबाज सैनिकों को युद्ध क्षेत्र की ओर रवाना करने वाला है।
जमीन पर उतर सकती है अमेरिकी सेना
अब तक यह युद्ध मुख्य रूप से हवाई हमलों और मिसाइलों तक सीमित था लेकिन ताजा इनपुट्स बताते हैं कि व्हाइट हाउस अब ग्राउंड ऑपरेशन के विकल्पों पर गंभीरता से विचार कर रहा है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार इन सैनिकों की तैनाती का मकसद सिर्फ बैकअप देना नहीं बल्कि जरूरत पड़ने पर ईरानी क्षेत्र के भीतर घुसकर ऑपरेशन को अंजाम देना है।
इसमें ईरान के लाइफलाइन माने जाने वाले ‘खार्ग द्वीप’ (जहाँ से ईरान का 90% तेल निर्यात होता है) और हॉर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा जैसे क्रिटिकल मिशन शामिल हो सकते हैं।
18 घंटे में हमला करने की क्षमता
सैनिकों की जिस 82nd एयरबोर्न डिवीजन को चुना गया है उसकी खासियत यह है कि यह आदेश मिलने के मात्र 18 घंटे के भीतर दुनिया के किसी भी कोने में पैराशूट जंप के जरिए हमला करने में सक्षम है। इसे भेजने का सीधा मतलब है कि अमेरिका अब क्विक रिस्पांस मोड में है। गौरतलब है कि इससे पहले यूएसएस बॉक्सर युद्धपोत और हजारों मरीन कमांडो पहले ही क्षेत्र में तैनात किए जा चुके हैं जिससे वहां मौजूद कुल अमेरिकी सैनिकों की संख्या 50,000 के पार पहुँच गई है।
शांति की चर्चा बनाम युद्ध की विभीषिका
सोमवार को ट्रंप ने अपने ट्रुथ सोशल पोस्ट में संकेत दिया था कि ईरान के साथ बातचीत सकारात्मक रही है और उन्होंने बिजली संयंत्रों पर हमले की धमकी टाल दी थी। हालांकि तेहरान ने ऐसी किसी भी बातचीत से साफ इनकार कर दिया है। धरातल पर सच्चाई यह है कि 28 फरवरी से शुरू हुए इस सैन्य अभियान में अब तक ईरान के भीतर 9,000 ठिकानों को निशाना बनाया जा चुका है।
खतरे की घंटी और घरेलू दबाव
इस भीषण टकराव की कीमत भी चुकानी पड़ रही है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार अब तक 13 अमेरिकी सैनिकों की जान जा चुकी है और करीब 290 घायल हुए हैं। उधर अमेरिका के भीतर भी इस युद्ध को लेकर विरोध के स्वर तेज हो रहे हैं। हालिया सर्वे बताते हैं कि केवल 35% अमेरिकी ही इन हमलों का समर्थन कर रहे हैं जबकि 61% जनता इसके खिलाफ है। चुनाव के मुहाने पर खड़े ट्रंप के लिए यह सैन्य विस्तार एक बड़ा राजनीतिक जोखिम भी साबित हो सकता है।
