कपास की खेती की सम्पूर्ण जानकारी : उन्नत किस्मे ,रोग और रोगथाम के उपाय

Written by Saloni Yadav

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Cotton Farming : भारत का कपास उत्पादन में प्रथम स्थान रहा है। पिछले कुछ वर्षो से कपास का उत्पादन बढ़ रहा है ,इसके साथ ही कपास के भाव में तेजी देखने को मिल रही है ,इस कारण की वजह से किसान कपास की ओर आकर्षित हो रहे है। कपास की खेती कर भारत में 40 -50 लाख लोगो को रोजगार मिला है ,भारत में कपास की खेती 60 लाख किसानो को रोजी -रोटी उपलब्ध करवाती है। कपास का प्रयोग देश में उद्योग और खेतीबाड़ी के क्षेत्र में महत्वपूर्ण स्थान रखती है। बड़े -बड़े उद्योग को प्रारंभ करने में कच्चा माल उपलब्ध करने वाली मुख्य फसल है।

कपास विश्व और भारत की महत्वपूर्ण रेशे वाली और व्यापारिक फसल मानी जाती है। कपास की खेती के लिए अधिक पानी की आवश्यकता नहीं होती है। भारत में बहुत अधिक हानिकारक कीटनाशकों का प्रयोग कपास की खेती के लिए किया जाता है जिससे फसल में कम पैदावार होती है। भारत की बात करे तो कपास की खेती मुख्य रूप से गुजरात,महांराष्ट्र, मध्य प्रदेश, पंजाब, राजस्थान, हरियाणा, तामिलनाडू और उत्तर प्रदेश ,कर्नाटका आदि राज्यों में की जाती है। गुजरात का कपास की खेती में महत्वपर्ण प्रथम स्थान है। इसके बाद महाराष्ट का दूसरा और फिर पंजाब का तीसरा स्थान है। पंजाब में कपास की फसल सबसे ज्यादा उगाई जाने वाली खरीब की फसल है पंजाब में इसके रेशे की कुल पैदावार 697 किलो प्रति हैक्टेयर हो जाती है।

कपास रेशे से कपड़े तैयार करने का नैसर्गिक रेशा हैं। कपास एक नगदी फसल के रूप मानी जाती है। कपास को “श्वेत स्वर्ण’” के नाम से भी जाना जाता है। कपास की फसल का देश की अर्थव्‍यवस्‍था में अधिक योगदान है। कपास भारत में 123 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में उगाई जाती है।
भारत में 130 कीट की प्रजातिया पाई जाती है।

कपास की खेती के लिए आवश्यक जलवायु ,तापमान और मिट्टी

कपास की खेती के लिए चमकीली और पाला रहित जलवायु आवश्यक होती है। कपास की खेती के लिए 15-35°स तापमान की आवश्यकता होती है। और 55-100 cm वर्षा की आवश्यकता होती है। कपास की खेती उपजाऊ ,नरम और अच्छे निकास वाली मिट्टी अच्छी मानी जाती है। कपास की मिट्टी का PH मान 6-8 मानी जाती है।कपास की खेती के लिए रेतीले ,खारी ,जलजमाव वाली जमीन अच्छी नहीं होती है जिससे फसल की अच्छी पैदावार नहीं होती है। मिट्टी की गहराई 20-25 सैं.मी से अधिक होनी चाहिए।

कपास की खेती के लिए खेत को तैयार व् बिजाई करना

कपास की खेती के लिए सबसे पहले खेती की जुताई की जाती है उसके बाद उसमे आप गोबर की खाद भी डाल सकते हो जिससे अच्छी पैदावार होती है। इसके साथ आप फिर से खेत की जुताई कर सकते है। बीज को बोन को उचित समय अप्रैल महीने में होता है। पंजाब में फसल चक्र को अपनाया जाता है फसल चक्र कपास की खेती के लिए लाभदायक होती है। केपास का बीज
5 सैं.मी. की गहराई पर बोना चाहिए।

सिचाई का समय

कपास की खेती की लिए अधिक पानी के आवश्यकता नहीं होती है। कपास की बिजाई के बाद एक बार सिचाई करे ,फिर जब कपास की टहनिया आने लगे तब बिजाई के 45-55 दिनों के बाद करनी चाहिए। फिर बिजाई के 75-85 दिनों के बाद फूल आने के समय करनी चाहिए। फिर एक बार टिंडे बनने के समय की जानी चाहिए। कपास में पानी देने पर पानी की जांच करनी चाहिए यानि खारे पानी से सिचाई नहीं करनी चाहिए।

कपास की उन्नत किस्मे

बीटी कपास (Bt Cotton):

    • बीटी कपास में Bacillus thuringiensis (Bt) बैक्टीरिया का जीन डाला गया है, जो इसे कीटों से बचाव करने में सक्षम बनाता है।
    • यह गुलाबी सुंडी और अन्य कीटों के हमले से कपास को सुरक्षित रखता है।
    • प्रमुख बीटी कपास किस्में: Bt वेराइटी 1, Bt वेराइटी 2, Bt वेराइटी 3 आदि।

एच-4 (H-4):

    • यह किस्म मध्यम लम्बे रेशों वाली होती है और अधिक उपज देती है।
    • महाराष्ट्र और गुजरात में लोकप्रिय।

एलआरके-516 (LRK-516):

    • यह किस्म सूखा प्रतिरोधी है और इसके रेशे लंबे और मजबूत होते हैं।
    • यह महाराष्ट्र और कर्नाटक में उगाई जाती है।

बीसी-68-2 (BC-68-2):

    • यह एक उन्नत किस्म है जो उच्च उत्पादन और बेहतर गुणवत्ता प्रदान करती है।
    • पंजाब और हरियाणा में मुख्य रूप से उगाई जाती है।

डीसीएच-32 (DCH-32):

    • यह एक हाइब्रिड किस्म है जिसे दक्षिण भारत में उगाया जाता है।
    • इसकी विशेषता लंबे और उच्च गुणवत्ता वाले रेशे हैं।

सुजाता (Sujata):

    • यह किस्म राजस्थान और मध्य प्रदेश में अधिक उपज देती है।
    • इसमें मध्यम लंबाई के रेशे होते हैं और यह सूखे के प्रति सहनशील होती है।

श्री राम 6488

  • इस किस्म की अवधि 155 से 160 दिनों की होती है। यह किस्म 160 दिनों में तैयार हो जाती है। इनके टिंडे का वजन 4 से 4.5 ग्राम होता है।

H 777

  • इसकी अवधि 175- 180 दिनो तक होती है ,इसकी पैदावार 6.4 क्विंटल प्रति एकड़ है। इस कपास के फाइबर के लम्बाई 22.5 मि.मी मानी जाती है।

डब्लू एच एच 09बीटी

  • यह किस्म महीन रेशे की होती है। यह अच्छी गुणवत्ता वाली होती है यह किस्म खण्डवा, खरगौनव के क्षेत्र में पाई जाती है। कपास की अन्य किस्मे इस प्रकार है- डी.सी.एच. 32,एच-8 ,जी कॉट हाई.10 ,जेके.-4 ,जवाहर ताप्ती,और जेके.-5 आदि किस्मे है।

कपास में लगने वाले रोग व् रोगथाम के उपाय

झुलसा रोग

यह रोग रेशे को खराब कर देता है ,और बीज भी सिकुड़ जाता है। यह रोग कपास की पतियों पर भूरे रंग के छोटे -छोटे धब्बे बनाते है ,जो की बाद में काले -भूरे और गोलाकार हो जाते है। इन धब्बो पर बनने वाली गोल वलय इनकी पहचान का लक्षण है। रोग से ग्रसित पत्तिया टूट कर गिर जाती है। पत्तिया गिरने से प्रकाश संष्लेषण की क्रिया प्रर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है ,जिससे पैदावार कम होती है। इस रोग को रोकने के लिए बीज को बोन से पहले बावेस्टीन कवक नाशी दवा की 1ग्राम मात्रा प्रति किलो को दर से बीजोपचार करना चाहिए।

पत्तों पर धब्बा रोग

इस रोग से पत्तो पर गोलाकार लाल धब्बे पड़ जाते है जो की बाद में बड़े होकर स्लेटी और सफेद रंग के हो जाते है। ये गोल होते है तथा इनके बीच लाल धरिया होती है। फिर वो दानो में परिवर्तित हो जाते है इसके रोकथाम के लिए फसल पर कॉपर ऑक्सीक्लोराइड3 ग्राम या मैनकोजेब 2.5 ग्राम को प्रति लीटर पानी में मिलाकर 3 से 4 बार 15 दिनों के फासला देते हुए छिड़काव करना चाहिए।

एंथ्राकनोस

इस रोग से भी टिंडे वाली जगह पर नुकसान होता है ,यह बीमारी भी धब्बो वाली और हल्के लाल रंग की होती है।,जिससे तने पर जख्म होता है और पौधा कमजोर पड़ जाता है। तथा बाद में यह बीमारी टिंडे के अंदर भी हो जाती है। इस बीमारी से टिंडे पर छोटे -छोटे पानी जैसे गोलाकार धब्बे हो जाते है।
इसके रोकथाम के लिए बिजाई से पहले कार्बेनडाज़िम का 3-4 ग्राम से उपचार करना चाहिए। इस रोग से प्रभावित पोधो को जड़ से उखाड़कर अन्य पोधो से अलग कर नष्ट करना चाहिए।

जड़ गलन

इस रोग से प्रभावित पौधा सूख जाता है ,और पत्तो का रंग पीला हो जाता है। इस रोग से प्रभावित पौधे को आसानी से उखाड़ा जा सकता है।
इस रोग के उपचार के लिए बिजाई से पहले नीम केक 60 किलो प्रति एकड़ डालना चाहिए। इस रोग को कम करने के लिए ट्राइकोडरमा विराइड 4 ग्राम बीजो का उपचार करे।

आल्टरनेरिया पत्तों के धब्बे

इस रोग से पत्तो पर पिले,भूरे रंग के गोलाकार धब्बे हो जाते है। प्रभावित पत्ते सुखकर गिरने शुरू हो जाते है। सूखे से प्रभावित पौधा इस बीमारी पर ज्यादा हमला करता है। पौष्टिक तत्वों की कमी से भी यह रोग होता है।
इस बीमारी के रोकथाम की लिए टैबुकोनाज़ोल 1 मि.ली. या ट्राइफलोकसीट्रोबिन+ टैबुकोनाज़ोल
का छिड़काव करे। इसके अलावा कॉपर ऑक्सीक्लोराइड और कार्बेनडाज़िम+ मैनकोज़ेब को पानी में मिलकर स्प्रे करनी चाहिए।

मुरझाना

इस बीमारी से पौधे पीले हो जाती है। पहले पीलापन बाहर फिर अंदर की तरफ हो जाता है। इस पौधे पर हमला कभी भी हो सकता है। इनके टिंडे भी छोटे होते है। इनका रंग काला और छाल के नीचे छल्ले जैसा हो जाता है।
इसके रोकथाम के लिए खेत में लगातार कपास की खेती नहीं करे। और पानी के निकास का पूरा ध्यान रखे। ट्राइकोडरमा विराइड फॉरमूलेशन का 4 ग्राम प्रति बीज पर उपचार करे। इसके रोकथाम की लिए थायोफैनेट मिथाइल 10 ग्राम व् यूरिया 50 ग्राम को 10 लीटर पानी में मिलाकर पौधे की जड़ो पर छिड़काव करना चाहिए।

कपास में लगने वाले कीट व् उपचार

 

थ्रिप्स

यह कीट दिखाई नहीं देते है ये पत्तो के नीचे से रस को चूसते है ,जिससे पत्तो का निचला हिस्सा भूरा हो जाता है।
फसल को 8 सप्ताह तक बचाने के लिए इमीडाक्लोप्रिड 70 डब्लयू एस 7 मि.ली. से बीज का उपचार करना चाहिए। इसके अलावा मिथाइल डेमेटान 25 ई सी 160 मि.ली. बुप्रोफेंज़िन 25 प्रतिशत एस सी 350 मि.ली. फिप्रोनिल 5 प्रतिशत एस सी 200-300 मि.ली., इमीडाक्लोप्रिड 70 % किसी एक को 200 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ में स्प्रे करें।

सफेद मक्खी

इस मख्खी के बच्चे पीले रंग के और गोल होते है। ये पत्तियों को चूसते है ,जिससे प्रकाश संश्लेषण पर बुरा प्रभाव पड़ता है। यह बीमारी फगस बन जाती है। इसकी बीमारी से पौधे कमजोर दिखाई देते है। और काले पड़ जाते है। इसका हमला होने पर टिंडे को झड़ना व् पूरी तरह से नहीं खिलना आदि लक्षण दिखाई देते है।
इसके रोकथाम के लिए सबसे पहले एक ही खेत में बार -बार कपास नहीं बोनी चाहिए। फसल चक्र अपनाना चाहिए। फसल को समय से बोये। अगर इस कीट को देखे तो ट्राइज़ोफॉस 3 मि.ली. या थायाक्लोराइड 4.5 ग्राम को प्रति लीटर पानी में मिलकर स्प्रे करनी चाहिए।

मिली बग

यह कीट पौधे की नीचे पाया जाता है ,और चिपचिपा पदार्थ छोड़ता है ,जिससे फगस उत्पन होते है। पौधे कमजोर हो जाते है और काले भी हो जाते है।
इसके रोकथाम के लिए बाजरा और जवार की फसलें कपास के पास उगाये। प्रभावित पोधो को जला देना चाहिए। यह कीट दिखाई दे तो प्रोफैनोफोस 500 मि.ली. को 150 लीटर पानी में मिलाकर प्रभावित पौधे पर स्प्रे करनी चाहिए।

तंबाकू सुंडी

यह कीट झुंड में मिलती है और पत्तो व् तनो को अपना शिकार बनती है। इस कीट का रंग हरा होता है।
इसके रोकथाम के लिए हमले की तीव्रता जानने के लिए रोशनी कार्डों का इस्तेमाल करे। इनको जल्दी नष्ट करना चाहिए। अगर हमला ज्यादा हो तो क्लोरपाइरीफॉस 20 ई सी 1 लीटर या
डाइफलूबैंज़ियूरॉन 25 प्रतिशत डब्लयू पी 100-150 ग्राम या क्लोरैंटरानीलीपरोल का छिड़काव या
स्प्रे करनी चाहिए।।

तेला कीट

ये कीट पत्तो का रस चूस लेते है ,जिससे पत्ते लाल व् भूरे हो जाते है। और मूड भी जाते है। ,व् सुखकर गिर जाते है।
इसके उपचार के लिए जड़ों के पास कार्बोफियूरन 3 जी फोरेट 10 जी 5 किलो प्रति एकड़ के अनुसार डाले। जब पौधा पीला पड़े या मूड जाये तब कीटनाशक का छिड़काव करे। इसके अलावा एसेटामीप्रिड 75 ग्राम प्रति 200 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करनी चाहिए।

इसके अलावा हरा मच्छर,सफेदमक्खी,माहो आदि कीट भी कपास में पाए जाते है।

खरपतवार नियंत्रण

हम आप को बता दे की पौधों में अधिक फैसला होने पर नदिनो का आक्रमण होता है ,जिससे अच्छी पैदावार नहीं होती है। यानी फसल की पैदावार में कमी आती है। नदिनो को रोकने के लिए हाथो से ,मशीनों से भी नष्ट किया जा सकता है। कपास के पास गाजर जैसे फसलों को नहीं बोये उससे मिलीबग रोग के होने का खतरा होता है।
कपास में बीजाई के बाद नदिनो के होने पर पैंडीमैथालीन 25-33 मि.ली.पानी में मिलाकर स्प्रे करनी चाहिए। बीजाई के बाद पेराकुएट (गरामोक्सोन) 24 प्रतिशतया ग्लाइफोसेट 1 लीटर को पानी में मिलाकर स्प्रे करे। नदिनो के कण उड़कर अन्य कपास को भी नुकसान पहुंचते है। नदीं नाशक की स्प्रे सुबह या शाम करनी चाहिए।

रोगो से होने वाली कमी और उनका इलाज

जिंक की कमी :

 

इससे पौधे का विकास नहीं हो पाता है और पौधा छोटा रह जाता है। और शखाऍ सुखकर गिर जाती है। पौधे के नए पत्ते खराब हो जाते है।

नाइट्रोजन की कमी:

इसमें भी पौधे का विकास नहीं होता है कद छोटा होता है। और पत्ते पीले होते है। ज्यादा होने से पत्ते पीले हो जाते है और सुख जाते है।

फासफोरस की कमी :

इसमें नए पत्ते गहरे हरे हो जाते है और और पुराने पत्ते छोटे हो जाते है।

पोटाश की कमी :

पोटाश की कमी से पौधे में पत्ते झड़ने शुरू हो जाते है। और टिंडे पूरी तरह नहीं खिलते है। पत्ते मुड़कर सुख जाते है।

पत्तों पर लाली आना

सबसे पहले यह जड़ो पर होती है और फिर पौधे की ऊपर वाले हिस्से पर हो जाती है। पत्तो में मैग्नीश्यिम सलफेट 1 किलो और यूरिया को पानी में मिलकर छिड़काव करे।

 

Saloni Yadav

मीडिया के क्षेत्र में करीब 3 साल का अनुभव प्राप्त है। सरल हिस्ट्री वेबसाइट से करियर की शुरुआत की, जहां 2 साल कंटेंट राइटिंग का काम किया। अब 1 साल से एन एफ एल स्पाइस वेबसाइट में अपनी सेवा दे रही हूँ। शुरू से ही मेरी रूचि खेती से जुड़े आर्टिकल में रही है इसलिए यहां खेती से जुड़े आर्टिकल लिखती हूँ। कोशिश रहती है की हमेशा सही जानकारी आप तक पहुंचाऊं ताकि आपके काम आ सके।

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