भारत से रिश्ते सुधारने की राह पर बांग्लादेश, अंतरिम सरकार ने व्यापार को राजनीति से अलग रखा, करेगा 50000 टन चावल की खरीदारी

बांग्लादेश की अंतरिम सरकार भारत के साथ तनाव कम करने और व्यापारिक रिश्ते मजबूत करने की कोशिश में है। वित्त सलाहकार सालेहुद्दीन अहमद ने कहा कि आर्थिक फैसले राजनीति से अलग रखे जा रहे हैं।

  • अंतरिम सरकार भारत के साथ रिश्तों को राजनीतिक शोर से अलग रखने की कोशिश में
  • व्यापार और जरूरत को प्राथमिकता, सस्ते आयात पर जोर
  • 50 हजार टन चावल खरीदने के फैसले से कूटनीतिक संकेत
  • तनाव के बीच ढाका की तरफ से संतुलन साधने की कोशिश

ढाका में बदले राजनीतिक हालात के बीच बांग्लादेश की अंतरिम सरकार भारत के साथ रिश्तों को दोबारा संतुलित करने की कोशिश में दिखाई दे रही है। मंगलवार को सरकार के वित्त सलाहकार सालेहुद्दीन अहमद ने साफ शब्दों में कहा कि मौजूदा प्रशासन भारत के साथ व्यापार और आर्थिक सहयोग को राजनीतिक बयानबाजी से अलग रखकर आगे बढ़ाना चाहता है।

सरकारी खरीद से जुड़े सलाहकार परिषद की बैठक के बाद पत्रकारों से बातचीत में अहमद ने बताया कि मुख्य सलाहकार मुहम्मद यूनुस भारत के साथ रिश्तों में आई तल्खी को कम करने के लिए सक्रिय रूप से कदम उठा रहे हैं।

उनके मुताबिक यूनुस अलग-अलग हितधारकों से संवाद कर रहे हैं ताकि दोनों देशों के बीच कामकाजी रिश्तों में सुधार की गुंजाइश बनाई जा सके।

जब उनसे यह सवाल किया गया कि क्या यूनुस ने सीधे भारत से संपर्क किया है, तो अहमद ने स्पष्ट किया कि फिलहाल सीधी बातचीत नहीं हुई है, लेकिन इस मसले से जुड़े लोगों के जरिए लगातार संवाद बना हुआ है। उन्होंने संकेत दिया कि सरकार पर्दे के पीछे रिश्तों को संभालने की रणनीति पर काम कर रही है।

वित्त सलाहकार ने यह भी जोर देकर कहा कि बांग्लादेश की व्यापार नीति किसी राजनीतिक दबाव से नहीं, बल्कि व्यावहारिक जरूरतों से तय होती है।

उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि अगर भारत से चावल आयात करना वियतनाम या अन्य देशों की तुलना में सस्ता पड़ता है तो आर्थिक दृष्टि से वही सही विकल्प होगा। अहमद के अनुसार वियतनाम से चावल मंगाने पर प्रति किलो करीब 10 टका अधिक खर्च आता है।

इसी संदर्भ में सरकार ने मंगलवार को भारत से 50 हजार टन चावल खरीदने के प्रस्ताव को मंजूरी दी। अहमद ने माना कि यह फैसला न सिर्फ आर्थिक रूप से फायदेमंद है, बल्कि इससे दोनों देशों के रिश्तों में सकारात्मक संकेत भी जाता है।

यह बयान ऐसे समय आया है जब कूटनीतिक हलकों में चर्चा है कि ढाका और भारत के बीच रिश्ते 1971 में बांग्लादेश की आज़ादी के बाद सबसे चुनौतीपूर्ण दौर से गुजर रहे हैं।

हाल के महीनों में दोनों देशों ने एक-दूसरे के राजनयिकों को तलब किया और कई जगह विरोध-प्रदर्शन भी देखने को मिले।

हालांकि, अहमद इन आकलनों से पूरी तरह सहमत नहीं दिखे। उन्होंने कहा कि हालात उतने खराब नहीं हैं, जितने बाहर से नजर आते हैं। उनके मुताबिक, कुछ बयान और घटनाएं ऐसी होती हैं जिन्हें पूरी तरह रोका नहीं जा सकता, लेकिन उन्हें पूरे रिश्ते का पैमाना मानना सही नहीं होगा।

भारत विरोधी बयानों पर पूछे गए सवाल के जवाब में वित्त सलाहकार ने साफ किया कि बांग्लादेश किसी भी तरह की कड़वाहट नहीं चाहता। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर कोई बाहरी ताकत दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ाने की कोशिश करती है, तो उसका नुकसान सभी को होगा।

अहमद ने कहा कि ऐसे बयान बांग्लादेश की राष्ट्रीय सोच का प्रतिनिधित्व नहीं करते, बल्कि हालात को बेवजह जटिल बनाते हैं। सरकार का फोकस व्यावहारिक फैसलों, आर्थिक तर्क और पड़ोसी देशों के साथ स्थिर रिश्तों पर है। मौजूदा संकेत यही बताते हैं कि ढाका राजनीतिक दबावों के बीच भी नई दिल्ली के साथ संवाद और सहयोग का रास्ता खुला रखना चाहता है।

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