राजपाल यादव को क्यों नहीं मिली चेक जमा करने की इजाजत? 1.5 करोड़ की DD के पीछे का वो ‘सीक्रेट’ जो हर बैंक यूजर को जानना जरूरी है

राजपाल यादव को जमानत तो मिली लेकिन कोर्ट ने चेक की जगह 1.5 करोड़ की DD मांगी। जानिए चेक बाउंस के डर और डिमांड ड्राफ्ट की सुरक्षा के बीच का वो अंतर, जो आपकी बैंकिंग लाइफ के लिए बेहद जरूरी है।

  • चेक बनाम डीडी: भरोसे की जंग
  • बाउंस होने का जीरो रिस्क
  • प्री-पेड भुगतान की गारंटी
  • 1.5 करोड़ पर बैंकिंग शुल्क

मुंबई/दिल्ली: बॉलीवुड के चुलबुले अभिनेता राजपाल यादव, जो अपनी कॉमेडी से सबको हंसाते हैं, इन दिनों कानूनी उलझनों की वजह से सुर्खियों में हैं। हाल ही में उन्हें जमानत तो मिल गई, लेकिन कोर्ट के एक छोटे से आदेश ने बैंकिंग की दुनिया के एक बड़े अंतर को चर्चा में ला दिया है। कोर्ट ने साफ कह दिया— “चेक नहीं, सिर्फ डिमांड ड्राफ्ट (DD) चलेगा।”

आखिर करोड़ों रुपये के लेन-देन में चेक पर भरोसा क्यों टूटा? क्या राजपाल यादव के मामले ने चेक की साख पर सवाल खड़े कर दिए हैं? आइए समझते हैं इस पूरी कहानी का इनसाइड ट्रैक।

क्यों ‘विलेन’ बना चेक और ‘हीरो’ बना डीडी?

राजपाल यादव के मामले में पेंच तब फंसा जब पिछली बार उनके द्वारा दिया गया चेक ‘बाउंस’ हो गया। कानून की भाषा में चेक बाउंस होना एक गंभीर अपराध है। इसी कड़वे अनुभव से सबक लेते हुए इस बार कोर्ट ने 1.5 करोड़ रुपये के लिए डिमांड ड्राफ्ट (DD) की शर्त रखी।

दरअसल, चेक एक ‘प्रॉमिस’ (वादा) है। आप चेक काट कर देते हैं, तो बैंक तब पैसे काटता है जब वह क्लियरिंग में जाता है। अगर खाते में पैसे नहीं हैं, तो चेक बाउंस हो जाता है। लेकिन डिमांड ड्राफ्ट (DD) एक ‘प्री-पेड’ व्यवस्था है। डीडी बनवाने के लिए आपको बैंक को पहले पैसे देने पड़ते हैं, तभी बैंक उसे जारी करता है। यानी, अगर किसी के हाथ में डीडी है, तो इसका मतलब है कि पैसा बैंक के पास सुरक्षित जमा हो चुका है।

चेक VS डीडी: सुरक्षा और भरोसे की जंग

राजपाल यादव के फैन्स और आम नागरिक अक्सर उलझन में रहते हैं कि जेब में रखे चेक और हाथ में मौजूद डीडी में बेहतर क्या है?

  1. जिम्मेदारी किसकी?: चेक की इज्जत उसे साइन करने वाले व्यक्ति के हाथ में होती है। अगर साइन गलत हुए या पैसे कम हुए, तो चेक बेकार। लेकिन डीडी की जिम्मेदारी खुद बैंक लेता है। बैंक के साइन होते हैं, इसलिए इसके बाउंस होने का खतरा जीरो होता है।

  2. कैंसिलेशन का डर: चेक को जारी करने वाला व्यक्ति कभी भी ‘स्टॉप पेमेंट’ कर सकता है। लेकिन डीडी को इतनी आसानी से रोका नहीं जा सकता। यही वजह है कि कानूनी सेटलमेंट या अदालती मामलों में डीडी को सबसे भरोसेमंद माना जाता है।

  3. हस्ताक्षर का झमेला: चेक अक्सर ‘सिग्नेचर मिसमैच’ की वजह से अटक जाते हैं। डीडी में ऐसी कोई टेंशन नहीं होती क्योंकि इसे बैंक द्वारा प्रमाणित किया जाता है।

1.5 करोड़ की डीडी पर कितना आया ‘एक्टर’ को खर्च?

मुफ्त में मिलने वाले चेक के मुकाबले डीडी बनवाना थोड़ा महंगा सौदा है। राजपाल यादव को 1.5 करोड़ रुपये की डीडी बनवाने के लिए अपनी जेब थोड़ी और ढीली करनी पड़ी होगी।

  • SBI के नियम: आमतौर पर एसबीआई में 1000 रुपये पर 4 रुपये (जीएसटी सहित) का शुल्क लगता है। इस हिसाब से 1.5 करोड़ पर करीब 6,000 रुपये का चार्ज बनता है।

  • मैक्सिमम कैप: हालांकि, बड़े अमाउंट पर कई बैंक राहत भी देते हैं। एसबीआई की ‘मैक्स सुविधा’ के तहत यह चार्ज अधिकतम 2,000 रुपये तक सीमित हो सकता है। प्रीमियम ग्राहकों के लिए कई बार यह सर्विस फ्री भी होती है।

एक्सपायरी का खेल

चाहे चेक हो या डीडी, दोनों की उम्र सिर्फ 3 महीने होती है। अगर 90 दिनों के भीतर इसे बैंक में पेश नहीं किया गया, तो यह कागज का टुकड़ा बन जाता है। राजपाल यादव के केस ने यह साफ कर दिया है कि बड़े वित्तीय लेन-देन में ‘भरोसा’ सिर्फ कागजों पर नहीं, बैंक की गारंटी (DD) पर होना चाहिए।

News End

Click here to read more news in this category: News

Saloni Yadav

Saloni Yadav (Journalist): There is an experienced journalist who has covered many different topics in his 10-year career. He has worked with many large publications and is now offering his services on NFL Spice. Saloni Yadav always shares information based on authentic sources and his experience and gives right and reliable advice to readers. Contact Email: saloniyadav@nflspice.com Website: nflspice.com
फीडबैक या शिकायत के लिए: newsdesk@nflspice.com

Related Stories