नई दिल्ली/हरदा: भारतीय कृषि के परिदृश्य में ‘प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि’ (PM-KISAN) सिर्फ एक सरकारी योजना नहीं बल्कि उन करोड़ों लघु और सीमांत किसानों के लिए एक मजबूत आर्थिक ढाल बन गई है जो अक्सर खाद-बीज के लिए साहूकारों के कर्जजाल में फंस जाते थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा शुरू की गई इस महत्वाकांक्षी पहल ने देश के अन्नदाताओं को स्वावलंबन का एक नया मंत्र दिया है।
सीधे खाते में ‘सम्मान’ की शक्ति
योजना की सबसे बड़ी खासियत इसकी पारदर्शिता और समयबद्धता है। सालाना 6,000 रुपये की यह सहायता 2,000-2,000 रुपये की तीन समान किस्तों में सीधे किसानों के बैंक खातों (DBT) में भेजी जाती है। अब तक सरकार सफलतापूर्वक 22 किस्तें जारी कर चुकी है जिससे खेती की लागत और मौसम की अनिश्चितता से जूझ रहे किसानों को बड़ी राहत मिली है।
ग्राउंड जीरो से हकीकत
मध्य प्रदेश के हरदा जिले के गांवों में इस योजना का प्रभाव धरातल पर साफ देखा जा सकता है। यहाँ के किसान अब साहूकारों के चक्कर काटने के बजाय आत्मविश्वास के साथ मंडी जाते हैं।
बालगांव के किसान नरेन्द्र भाटी बताते हैं कि पीएम-किसान उनके लिए किसी वरदान से कम नहीं है। वह कहते हैं
“पहले बीज, खाद और कीटनाशक खरीदने के लिए मुझे ऊंचे ब्याज दरों पर पैसा उधार लेना पड़ता था। अब हर सीजन से पहले पैसा सीधे मेरे खाते में आ जाता है। मैं बिना किसी बिचौलिये के बाजार भाव पर इनपुट खरीद सकता हूं, जिससे मेरी उत्पादन लागत में काफी कमी आई है।”
इसी क्षेत्र के एक अन्य किसान नंदकिशोर गौर का कहना है कि समय पर किस्त मिलने से खेती के छोटे-छोटे काम कभी नहीं रुकते। चाहे खेत की जुताई हो या खड़ी फसल का रखरखाव, फंड ठीक उसी समय मिलता है जब इसकी सबसे ज्यादा जरूरत होती है।
पारदर्शिता ने जीता भरोसा
छिदगांव तमोली के अशोक गुर्जर इस योजना की पारदर्शिता को इसकी सबसे बड़ी ताकत मानते हैं। अशोक कहते हैं,
“अब खाद-बीज के लिए कर्ज लेने की जरूरत नहीं पड़ती। पहले उधारी का मतलब था अतिरिक्त ब्याज भरना। अब नकद पैसा हाथ में होने से हम कम कीमत पर सामान खरीदते हैं और आत्मनिर्भर बन गए हैं।”
बदलता ग्रामीण अर्थशास्त्र (Context Expansion)
विशेषज्ञों का मानना है कि पीएम-किसान ने न केवल ग्रामीण कर्जदारी को कम किया है बल्कि किसानों में एक नया आत्मविश्वास भी जगाया है। 22 किस्तों के सफर ने यह साबित कर दिया है कि यदि तकनीक और नेक नियति का मिलन हो तो सरकारी लाभ बिना किसी कटौती के अंतिम व्यक्ति तक पहुंच सकता है। लघु किसान जो संसाधनों की कमी के कारण पीछे रह जाते थे अब आधुनिक कृषि पद्धतियों और बेहतर बीजों को अपनाने की हिम्मत जुटा पा रहे हैं।
आज हरदा ही नहीं बल्कि पूरे देश का किसान इस योजना के निरंतर जारी रहने की उम्मीद करता है क्योंकि यह ₹6,000 उनके लिए सिर्फ एक आंकड़ा नहीं बल्कि उनके पसीने और मेहनत का ‘सम्मान’ है।
