फसल की तेज बढ़वार और ज्यादा उत्पादन की उम्मीद में किसान बड़ी मात्रा में रासायनिक खाद का उपयोग कर रहे हैं। लेकिन इसका असर सिर्फ खेत तक सीमित नहीं रहता।
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मिट्टी की उर्वरता होती है कम
लगातार यूरिया और अन्य रासायनिक खाद डालने से मिट्टी के प्राकृतिक पोषक तत्व घटने लगते हैं। समय के साथ जमीन की उत्पादक क्षमता कमजोर पड़ सकती है।
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सूक्ष्म जीवों को पहुंचता नुकसान
मिट्टी में मौजूद लाभकारी बैक्टीरिया और सूक्ष्म जीव फसलों के लिए बेहद जरूरी होते हैं। रासायनिक खाद का अधिक उपयोग इनके संतुलन को बिगाड़ सकता है।
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पानी की गुणवत्ता पर असर
खेतों में डाली गई अतिरिक्त खाद बारिश या सिंचाई के पानी के साथ बहकर तालाबों, नहरों और भूजल तक पहुंच सकती है, जिससे जल प्रदूषण बढ़ता है।
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फसल की लागत बढ़ती है
जब मिट्टी की ताकत कम होने लगती है तो किसान को पहले से ज्यादा खाद डालनी पड़ती है। इससे खेती की लागत लगातार बढ़ती जाती है।
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मानव स्वास्थ्य पर भी खतरा
कुछ मामलों में रासायनिक अवशेष खाद्य पदार्थों के जरिए शरीर तक पहुंच सकते हैं। विशेषज्ञ संतुलित और जरूरत के अनुसार खाद उपयोग की सलाह देते हैं।
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जैविक विकल्प बन सकते हैं सहारा
गोबर की खाद, वर्मी कम्पोस्ट, हरी खाद और जैव उर्वरक मिट्टी की सेहत सुधारने में मदद करते हैं। इनके उपयोग से जमीन लंबे समय तक उपजाऊ बनी रह सकती है।
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संतुलित खेती ही बेहतर रास्ता
अच्छी पैदावार के लिए केवल रासायनिक खाद पर निर्भर रहना सही नहीं है। मिट्टी परीक्षण और संतुलित पोषण प्रबंधन अपनाकर किसान बेहतर परिणाम प्राप्त कर सकते हैं।