- हंसीरा को नूंह अदालत से मिली नियमित जमानत
- पुलिस अधिकारियों को कोर्ट का कारण बताओ नोटिस
- सुप्रीम कोर्ट के गिरफ्तारी नियमों की अनदेखी पर बरसी अदालत
हरियाणा के नूंह जिले से एक ऐसी कानूनी खबर सामने आई है जिसने न सिर्फ सोशल मीडिया की दुनिया में हलचल मचा दी है, बल्कि पुलिस के काम करने के तरीके पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। चर्चित सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर हंसीरा उर्फ हंसी, जिन पर फेसबुक के जरिए एक विशेष समुदाय के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी करने का आरोप लगा था, उन्हें अदालत ने नियमित जमानत दे दी है। लेकिन यह मामला सिर्फ एक जमानत तक सीमित नहीं रहा, बल्कि कोर्ट ने पुलिस को भी आड़े हाथों लिया है।
नूंह की अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश शशि चौहान की अदालत ने मामले की सुनवाई करते हुए पुन्हाना सिटी थाना प्रभारी राजेश कुमार और डीएसपी जितेंद्र कुमार राणा को कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया है। अदालत का यह कड़ा रुख उन खामियों की वजह से है जो गिरफ्तारी की प्रक्रिया के दौरान पुलिस की तरफ से बरती गईं। जज ने साफ शब्दों में कहा कि गिरफ्तारी करते वक्त सुप्रीम कोर्ट के उन लैंडमार्क निर्देशों की धज्जियां उड़ाई गई हैं जो किसी भी नागरिक के अधिकारों की रक्षा के लिए बनाए गए हैं।
पूरे मामले की जड़ 8 जनवरी की वह शिकायत है जो रोहित नाम के व्यक्ति ने पुन्हाना सिटी थाने में दर्ज कराई थी। आरोप यह था कि हंसीरा ने सीएनजी गाड़ियों से जुड़े एक वीडियो में दलित समाज के प्रति कुछ ऐसे शब्दों का इस्तेमाल किया जो बेहद आपत्तिजनक और कानूनन जुर्म थे। पुलिस ने इस मामले में फुर्ती दिखाते हुए उसी दिन एफआईआर दर्ज की और हंसीरा को सलाखों के पीछे पहुंचा दिया।
जब यह मामला अदालत की चौखट पर पहुँचा, तो बचाव पक्ष के वकील ताहिर हुसैन देवला ने पुलिस की पूरी थ्योरी को कानूनी मोर्चे पर घेर लिया। उन्होंने दलील दी कि जिस अपराध में सजा सात साल से कम हो, उसमें पुलिस सीधा किसी को उठा नहीं सकती। वकील ने सुप्रीम कोर्ट के मशहूर अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य मामले का हवाला देते हुए बताया कि पुलिस को पहले जांच में शामिल होने के लिए नोटिस देना चाहिए था, जो हंसीरा के मामले में नहीं दिया गया।
कानूनी दांव-पेंच के बीच करीब 45 मिनट तक कोर्ट रूम में बहस का माहौल गरमाया रहा। एक तरफ सरकारी वकील जगबीर सिंह आरोपों की गंभीरता की दुहाई दे रहे थे, तो दूसरी तरफ कानून की प्रक्रियाओं का सवाल खड़ा था। आखिरकार अदालत ने यह पाया कि गिरफ्तारी की चेकलिस्ट और मजिस्ट्रेट के सामने पेश किए गए कारणों में भारी कमी थी।
जज शशि चौहान ने 13 जनवरी को अपना आदेश सुनाते हुए साफ कर दिया कि यह जमानत आरोपों की मेरिट या बेगुनाही पर नहीं, बल्कि पुलिस द्वारा अपनाई गई गलत कानूनी प्रक्रिया की वजह से दी जा रही है। अदालत ने हंसीरा को 50 हजार रुपये के निजी मुचलके पर रिहा करने का आदेश दिया, लेकिन साथ ही उन पुलिस अधिकारियों की जवाबदेही भी तय कर दी जिन्होंने कानून को ताक पर रखकर गिरफ्तारी की थी। अब इन अधिकारियों को 19 जनवरी तक अदालत में जवाब देना होगा कि आखिर उन्होंने तय नियमों का पालन क्यों नहीं किया।
यह फैसला नूंह के गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है क्योंकि यह याद दिलाता है कि कानून की नजर में प्रक्रिया उतनी ही महत्वपूर्ण है जितना कि खुद अपराध।
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