टनकपुर-बनबसा फोरलेन: विकास या विनाश? स्थानीय लोगों ने खोला मोर्चा, सीएम और गडकरी से की बाईपास की बड़ी मांग

टनकपुर/बनबसा: उत्तराखंड के सीमांत क्षेत्र टनकपुर और बनबसा के बीच प्रस्तावित फोरलेन हाईवे का प्रोजेक्ट अब सरकारी फाइलों से निकलकर जन-आक्रोश की जद में आ गया है। इस महत्वाकांक्षी परियोजना को लेकर स्थानीय निवासियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने एक सुर में विरोध की आवाज बुलंद कर दी है।

मामला सिर्फ सड़क चौड़ीकरण का नहीं है बल्कि उन हजारों परिवारों की आजीविका और दुकानों का है जो इस हाईवे की जद में आकर उजड़ने की कगार पर हैं।

सामाजिक कार्यकर्ता दीप चंद्र पाठक ने इस मुद्दे को लेकर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी को एक विस्तृत ज्ञापन सौंपा है।

रिपोर्ट में आगाह किया गया है कि यदि वर्तमान स्वरूप में ही फोरलेन का निर्माण हुआ तो यह विकास नहीं बल्कि एक बड़ा विस्थापन साबित होगा।

आखिर क्यों उठ रहे हैं विरोध के सुर?

प्रस्तावित हाईवे ककराली गेट से बनबसा तक के उस घने हिस्से से गुजर रहा है जहां न केवल मुख्य बाजार हैं, बल्कि उपजाऊ कृषि भूमि और सैंकड़ों रिहायशी मकान भी स्थित हैं।

स्थानीय लोगों का तर्क है कि इस निर्माण से सालों से जमी-जमाई दुकानें जमींदोज हो जाएंगी, जिससे क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को गहरा धक्का लगेगा।

10 हजार छात्रों की सुरक्षा दांव पर

रिपोर्ट में एक बेहद गंभीर पहलू की ओर इशारा किया गया है जो है शैक्षणिक संस्थानों की सुरक्षा। इस क्षेत्र में कई स्कूल और कॉलेज हैं जिनमें लगभग 10 हजार छात्र पढ़ते हैं।

हाईवे बनने से तेज रफ्तार ट्रैफिक के बीच इन छात्रों की सुरक्षा को लेकर परिजन बेहद चिंतित हैं। साथ ही मां पूर्णागिरी धाम जाने वाले लाखों श्रद्धालुओं और बस अड्डों पर जुटने वाली 15 हजार की दैनिक भीड़ के कारण यह इलाका दुर्घटनाओं का ब्लैक स्पॉट बन सकता है।

क्या है जनता का ‘प्लान-बी’?

क्षेत्रवासियों ने सरकार के सामने केवल विरोध नहीं जताया, बल्कि एक व्यवहार्य विकल्प भी रखा है। ज्ञापन में सुझाव दिया गया है कि सरकार एलिवेटेड रोड या वैकल्पिक बाईपास पर विचार करे।

स्थानीय लोगों का प्रस्ताव है कि प्रस्तावित बाईपास को जगबुड़ा पुल से हुड्डी क्षेत्र होते हुए किरोड़ा नाले के पास से निकाला जाए। इससे सरकारी खजाने पर भूमि अधिग्रहण का बोझ कम होगा और सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि स्थानीय लोगों को बेघर होने से बचाया जा सकेगा। अब देखना यह है कि दिल्ली और देहरादून की सरकारें इस सीमांत क्षेत्र की पुकार पर क्या रुख अपनाती हैं।

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