US-Iran War: होर्मुज की घेराबंदी से क्या भारत में महंगा होगा पेट्रोल? जानें 8 हफ्ते के ‘सुरक्षा कवच’ का पूरा सच
मध्य-पूर्व (Middle-East) में छिड़ी भीषण जंग ने दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण 'तेल-गली' होर्मुज स्ट्रेट पर संकट के बादल गहरा दिए हैं। क्या भारत में पेट्रोल-डीजल की किल्लत होगी? सरकार के 8 हफ्ते के बैकअप प्लान और रूस के साथ 'सीक्रेट' सुरक्षा कवच की पूरी इनसाइड स्टोरी यहाँ पढ़ें।
- होर्मुज की घेराबंदी और वैश्विक तेल संकट
- भारत का 8 हफ़्तों का इमरजेंसी ऑयल बफर
- रूस बना भारत के लिए ‘संकटमोचक’ ढाल
- बाजार एक्सपर्ट्स की निवेशकों को खास सलाह
नई दिल्ली/दुबई: मध्य-पूर्व में युद्ध की लपटें अब उस मुहाने पर पहुंच गई हैं, जहां से दुनिया की अर्थव्यवस्था की धड़कनें तय होती हैं। ईरान के सुप्रीम लीडर अली खामेनेई की मौत के बाद ऑपरेशन एपिक फ्यूरी (Operation Epic Fury) ने खाड़ी देशों में बारूद की गंध भर दी है। जवाबी कार्रवाई में ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (IRGC) ने होर्मुज स्ट्रेट (Strait of Hormuz) को बंधक बनाने की धमकी दी है जिससे वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security) खतरे में है।
होर्मुज की नाकेबंदी: क्यों कांप रही है दुनिया?
दुनिया के कुल तेल व्यापार का लगभग पांचवां हिस्सा इसी तंग रास्ते से गुजरता है। वर्तमान में लगभग 150 जहाज समुद्र के बीच फंसे हुए हैं और प्रमुख शिपिंग दिग्गजों जैसे Maersk और Hapag-Lloyd ने अपने जहाजों को अफ्रीका के केप ऑफ गुड होप के लंबे रास्ते पर डायवर्ट (Divert) कर दिया है। इससे न केवल माल ढुलाई का समय बढ़ेगा, बल्कि लॉजिस्टिक लागत (Logistics Cost) में भी भारी इजाफा होने वाला है।
भारत का सुरक्षा कवच – 8 हफ्ते का बैकअप
आम आदमी के मन में सबसे बड़ा सवाल है की क्या पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ेंगे? पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने स्थिति स्पष्ट करते हुए बताया कि भारत के पास वर्तमान में 25 दिनों का क्रूड ऑयल और 25 दिनों का तैयार ईंधन भंडार मौजूद है।
कुल मिलाकर देश के पास 8 सप्ताह का रणनीतिक भंडार (Strategic Reserves) है, जो किसी भी तात्कालिक कमी को रोकने के लिए पर्याप्त है।
रूस बना भारत का ‘गेम चेंजर’
दिलचस्प तथ्य यह है कि भारत अब अपनी तेल जरूरतों के लिए होर्मुज स्ट्रेट पर पूरी तरह निर्भर नहीं है। भारत का केवल 40% कच्चा तेल इस रास्ते से आता है। बाकी 60% हिस्सा अन्य सुरक्षित मार्गों से आता है, जिसमें रूस (Russia) की हिस्सेदारी सबसे बड़ी है। विशेषज्ञों का मानना है कि रूस से जारी तेल आयात इस युद्ध काल में भारत के लिए एक मजबूत आर्थिक सुरक्षा कवच (Economic Shield) साबित हो रहा है।
बाजार और कीमतें – क्या कहता है गणित?
बाजार विश्लेषकों (Market Analysts) के अनुसार, यदि तनाव कम नहीं हुआ, तो ब्रेंट क्रूड की कीमतें 90 से 100 डॉलर प्रति बैरल तक जा सकती हैं। हालांकि, ओपेक प्लस (OPEC+) देशों ने उत्पादन बढ़ाकर बाजार को संतुलित करने की कोशिश शुरू कर दी है।
एक्सपर्ट व्यू: जियोजीत इन्वेस्टमेंट्स के डॉ. वी.के. विजयकुमार का कहना है कि निवेशकों को घबराहट में बिकवाली (Panic Selling) से बचना चाहिए। इतिहास गवाह है कि बड़े संकटों के बाद भी बाजार 6 महीने के भीतर अपनी पुरानी रफ्तार पकड़ लेता है।
सिर्फ स्टॉक काफी नहीं
भले ही भारत अभी सुरक्षित स्थिति में है, लेकिन CEEW जैसे थिंक-टैंक का मानना है कि हमें लंबे समय के लिए एलएनजी (LNG) भंडारण क्षमता बढ़ानी होगी और ऊर्जा के अन्य स्रोतों की ओर तेजी से मुड़ना होगा। होर्मुज का संकट एक चेतावनी है कि वैश्विक सप्लाई चेन (Supply Chain) कभी भी ध्वस्त हो सकती है।



