तेहरान/न्यूयॉर्क: दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री रास्तों में से एक, 'स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज' (Strait of Hormuz) को लेकर ईरान ने एक ऐसी चेतावनी दी है जिसने वैश्विक ऊर्जा बाजार में खलबली मचा दी है। ईरानी मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, संयुक्त राष्ट्र की समुद्री एजेंसी (IMO) में ईरान के प्रतिनिधि अली मूसावी ने रविवार को स्पष्ट किया कि यह जलमार्ग सभी के लिए खुला है, सिवाय उन जहाजों के जो "ईरान के दुश्मनों" से जुड़े हैं।
ईरान का यह बयान ऐसे समय में आया है जब अमेरिका और इजरायल के साथ उसके तनाव ने एक छद्म युद्ध (Proxy War) का रूप ले लिया है। हॉर्मुज जलडमरूमध्य, जिससे दुनिया के कुल तेल और लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) का लगभग पांचवां हिस्सा गुजरता है, इस समय एक 'बैटलग्राउंड' बना हुआ है।
कूटनीति बनाम युद्ध: ईरान की शर्त
अली मूसावी ने कहा कि तेहरान अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन के साथ सहयोग करने और खाड़ी में नाविकों की सुरक्षा बढ़ाने के लिए तैयार है। हालांकि, उन्होंने एक बड़ी शर्त जोड़ दी है। मूसावी के अनुसार, जो जहाज ईरान के विरोधियों से संबंधित नहीं हैं, वे तेहरान के साथ सुरक्षा और सुरक्षा व्यवस्था का समन्वय (Coordinate) करके आसानी से गुजर सकते हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि "ईरान की प्राथमिकता कूटनीति है, लेकिन आक्रामकता का पूर्ण खात्मा और आपसी विश्वास उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं।"
वैश्विक ऊर्जा संकट का गहराता डर
ईरान ने सीधे तौर पर इस तनाव की जड़ इजरायल और अमेरिका के हमलों को बताया है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर हॉर्मुज के इस संकरे रास्ते से आवाजाही पूरी तरह बाधित होती है, तो दुनिया को एक बड़े 'एनर्जी शॉक' का सामना करना पड़ सकता है। फिलहाल, हमले के डर से अधिकांश बड़े जहाजों ने इस रास्ते से दूरी बना ली है, जिससे ढुलाई की लागत (Freight Cost) और बीमा प्रीमियम में भारी उछाल आया है।
भारत पर क्या होगा असर?
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए खाड़ी देशों पर बहुत हद तक निर्भर है। हॉर्मुज में किसी भी तरह की पाबंदी का मतलब है—पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की कीमतों में बेतहाशा बढ़ोतरी। भारतीय सुरक्षा एजेंसियां भी इस स्थिति पर पैनी नजर रख रही हैं, क्योंकि यह जलमार्ग न केवल तेल बल्कि भारतीय निर्यात के लिए भी एक जीवनरेखा (Lifeline) है।
ईरान का "कोऑर्डिनेशन" वाला प्रस्ताव एक तरह से इस समुद्री क्षेत्र पर अपने पूर्ण नियंत्रण का दावा करने जैसा है। अब देखना यह होगा कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय और खासकर 'ईरान के दुश्मन' कहे जाने वाले देश इस नई चुनौती का क्या जवाब देते हैं।
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