खेती किसानी

हरियाणा में बदला खेती का ट्रेंड: कपास बेल्ट में अचानक क्यों बढ़ी धान और बाजरे की डिमांड?

हरियाणा प्रदेश के किसान कपास की खेती से किनारा करते नजर आ रहे है क्योंकि प्रदेश में कपास के रकबे में काफी कमी इस साल देखने को मिल रही है। प्रदेश में किसानों का कपास से मुहं मोड़ना चिंता का विषय है लेकिन किसानों के सामने फिलहाल कोई चारा भी नजर नहीं आ रहा है। आइये जानते है की आखिर ऐसी क्या वजह है जो किसान अब कपास की खेती छोड़ रहे है।

किसान भाइयों नमस्कार, पहले हरियाणा में कपास की खेती काफी अधिक की जाती है लेकिन पिछले कुछ सालों में अचानक इसकी खेती से किसानों को मोह भंग हो चुका है। अब किसान कपास की खेती की जगह पर बाजरा की खेती करने लगे है। हम अपने इलाके में भी साल दर साल देखते है की कपास की खेती में काफी कमी आ गई है। पहले अपने यहाँ पर भी हम कपास की खेती करते थे लेकिन अब हमने भी कपास की खेती करना बंद कर दिया है। किसान भाइयों ऐसा नहीं है की कपास की खेती बिलकुल बंद हो गई है। कुछ किसान आज भी कपास की खेती कर रहे है लेकिन लगता है की आने वाले समय में उनके द्वारा भी इसकी खेती बंद कर दी जाएगी।

प्रदेश के किसान भाइयों का कपास की खेती से मोहभंग होने के कई कारण है जिनके चलते कपास की खेती काफी कम हो गई है। प्रदेश भर में किसानों को कपास की खेती से पिछले कुछ सालों में काफी आर्थिक नुकसान देखने को मिला है जिसमे एक तो खेत की लागत में काफी बढ़ौतरी हो गई है और दूसरा कीटों के हमले के चलते पैदावार में भारी कमी आई और इसकी के कारण किसान अब इसकी खेती नहीं कर रहे है। एक कारण ये भी है की प्रदेश में मजदूरी इतनी अधिक हो चुकी है की मजदूरी देने के बाद में किसान के हाथ में कुछ भी नहीं बचता है। चलिए किसान भाइयों आपको तथ्यों के साथ में हम थोड़ी अधिक डिटेल में इसकी जानकारी देते है।

HAU की तरफ से जारी आंकड़े और हालिया रिपोर्ट

किसान भाइयों चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय (HAU) की और से और हालिया सामने आये कृषि आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में कपास की खेती करना किसानों के लिए पूरी तरह से घाटे का सौदा साबित हो रही है और इसके पिछले जो कारण सामने आये है उनके बारे में भी आपको एक एक करके जानकारी दे देते है।

कपास के खेत - पहले और अब
कपास के खेत – पहले और अब

इससे पहले एक बात आपको और बता दें की प्रदेश में कपास की खेती का जो रकबा हुआ करता था उसमे भी काफी भारी गिरावट दर्ज हुई है। 2020 की कपास के रकबे की रिपोर्ट थी उसमे 7.20 लाख हेक्टेयर में कपास की बुवाई किसान करते थे लेकिन अभी 2026 की अगर बात करें तो प्रदेश में अब कपास का रकबा 2.82 लाख हेक्टेयर ही रह गया है जो आने वाले कुछ सालों में और भी कम हो जायेगा। प्रदेश में सबसे अधिक असर जो हुआ है वो जींद, भिवानी, झज्झर, रेवाड़ी, सिरसा और फतेहाबाद में देखने को मिला है।

कपास में गुलाबी सुंडी (Pink Bollworm) का प्रकोप

प्रदेश में कपास के रकबे में कमी आने का एक कारण गुलाबी सुंडी (Pink Bollworm) का प्रकोप भी है क्योंकि अभी तक किसान बीटी-कॉटन (Bt-Cotton) को इस रोग से सुरक्षित मानते थे लेकिन अब गुलाबी सुंडी के प्रकोप से ये भी नहीं बच पाई है। गुलाबी सुंडी के प्रकोप से किसानों की पैदावार में लगभग 30 फीसदी तक की गिरावट देखने को मिली किसानों को जो औसत पैदावार 5.70 क्विंटल प्रति एकड़ मिलती थी उसमे गिरावट हुई और अब लगभग 2 से 3 क्विंटल प्रति एकड़ ही रह गई है।

सफेद मक्खी से खराब हुए कपास के टिंडे
सफेद मक्खी से खराब हुए कपास के टिंडे

कपास की खेती में किसानों को अगर मुनाफा कमाना है तो प्रति एकड़ में इसकी पैदावार 5 क्विंटल होनी बहुत ही जरुरी है। लेकिन ये केवल किसान को मुनाफे में लेकर आता है और अच्छी कमाई अगर कपास की खेती से करनी है तो पैदावार 8 क्विंटल प्रति एकड़ में जरुरी हो जाती है जो अब किसानों के लिए असंभव सी प्रतीत हो रही है।

कीटनाशकों और लेबर की बढ़ती लागत से किसान परेशान

किसान भाई अपने खेतो में कपास की अधिक पैदावार लेने के लिए अधिक से अधिक कीटनाशकों का स्प्रे करते है और इन कीटनाशकों की कीमत में भी पिछले कुछ सालों में काफी अधिक बढ़ौतरी देखने को मिली है। कई बार तो कीटनाशकों के स्प्रे के बाद भी गुलाबी सुंडी का प्रकोप कम नहीं होता है। किसानों के लिए ये भी एक बड़ा कारण है की उन्होंने अब कपास की खेती से किनारा कर लिया है।

इसके अलावा कपास की चुनने के लिए किसानों को अपने खेतों में मजदूरों को काम पर लगाना पड़ता है और आज के समय में मजदूरी भी काफी अधिक महँगी हो चुकी है। किसान जितना पैसा अब मजदूरी में दे रहे है उतना पैसा तो उनको कपास बेचने के बाद भी नहीं मिलता और जब कुछ बचत ही नहीं होगी तो किसान इसकी खेती क्यों करेंगे ये बड़ा सवाल है।

मौसम की मार और खेतो में जलभराव

किसान भाइयों प्रदेश में कई इलाकों में बारिश अधिक होने के चलते खेतों में काफी अधिक पानी जमा हो जाता है और कई कई दिन तक वो पानी खेतो में जमा रहता है जिसके चलते कपास की खेती नष्ट हो जाती है ये किसानों के लिए भारी आर्थिक नुकसान का कारण बनता है। पिछले कुछ सालों में किसान मौसम की मार के चलते भी कपास की खेती से किनारा कर रहे है क्योंकि मौसम में कब बदलाव हो जाए इसका आज के समय में कुछ सही से पता नहीं चल पा रहा है। कभी अधिक बारिश हो जाती है तो कभी सूखा पड़ जाता है। ये ऐसे कारण है जिससे किसानों की कपास की खेती एक झटके में ही ख़त्म हो जाती है।

कपास की खेती में भारी गिरावट दर्ज हुई है
कपास की खेती में भारी गिरावट दर्ज हुई है

अधिक पानी भरने के बाद में कपास में जड़ गलन रोग लग जाता है और जितने हिस्से में पानी का ठहराव है उतने हिस्से के कपास के सभी पौधे कुछ ही दिन में पूरी तरह से खत्म हो जाते हैं जिससे किसानों को सीधे तौर पर आर्थिक नुकसान होता है।

कपास छोड़कर किसान अब क्या कर रहे है?

प्रदेश में किसान कपास की खेती अब धीरे धीरे करके छोड़ते जा रहे है और अब किसान दूसरी फसलों की और अपना रुख कर रहे है। किसान भाई जिनके पास में अपना ट्यूबवेल है या सिंचाई का साधन है वे धान की खेती की और जा रहे है क्योंकि उसमे किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर पक्की खरीद की गारंटी भी मिल जाती है।

इसके अलावा जिन इलाकों में पानी की कमी रहती है और जिनको शुष्क इलाके कहा जाता है उन इलाकों के किसान भाई अब कपास की जगह पर बाजरा, ग्वार और मूंग जैसी फसलों की बुवाई कर रहे है क्योंकि इनमे कम पानी में भी अच्छी फसल मिल जाती है और कुछ दिन जल भराव हो भी जाता है अधिक बारिश के चलते तो अधिक नुकसान नहीं होता है।

तो किसान भाइयों इस आर्टिकल में हमने आपको बताया की कैसे हरियाणा प्रदेश में अब किसान कपास की खेती से किनारा कर रहे है और उसकी जगह पर अन्य खेती की और बढ़ रहे है। उम्मीद है आपको इस न्यूज़ के माध्यम से काफी अच्छी जानकारी प्राप्त हुई है। ऐसी ही किसानो से जुड़ी ख़बरों के लिए हमसे जुड़े रहिये हम आपको समय पर खेती से जुड़ी सभी प्रकार की जानकारी इस वेबसाइट पर उपलब्ध करवाते रहते है।

Vinod Yadav

विनोद यादव NFLSpice के संस्थापक और मुख्य लेखक हैं। इन्होंने टेक्सटाइल विषय से बी-टेक की पढ़ाई की है और हरियाणा के रेवाड़ी जिले में अपने किसान परिवार के साथ खेती करते हैं। फसलों की देखरेख, बुवाई, सिंचाई, कटाई और फसलों में लगने वाले रोग तथा उनकी रोकथाम पर ये अपने खेत के अनुभव से लिखते हैं।

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