खुरपका-मुंहपका रोग – कभी नहीं आयेगा, ये फ्री का करो ईलाज

Kavita Yadav
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khurpkaa-munhpkaa-rog ke lakshan or ilaj kya hai

Animal Husbandry News : गावं देहात में ज्यदातर लोग पशुपालन करके अपनी आमदनी करते हैऔर परिवार का गुजर बसर करते है। इसके साथ ही बहुत से लोग डेयरी फार्म भी करते है जिससे में मुनाफा कमाई करते है। लेकिन कई बार पशुओं में ऐसी बिमारियों को जाती है जिनके बारे में पशुपालन करने वालों को पता नहीं होता और फिर पशुओं को होने वाली परेशानियों के चलते पशु भी परेशान होता है और पशुपालक को भी काफी नुकसान उठाना पड़ता है।

पशुओं में ऐसी ही एक बीमारी होती है जिसके होने पर पशु ना तो चारा खा पाता है और ना ही चल पाता है। उस बीमारी का नाम है खुरपका-मुंहपका रोग और इस बीमारी के चलते पशुओं को बहुत अधिक कष्ट का सामना करना पड़ता है। मुख्य रूप से ये रोग गे और भैंसों के साथ साथ भेद और बकरियों में भी देखने को मिलता है।

इस रोग के कारण पशुओं की दूध देने की छमता पर बुरी तरफ से प्रभाव पड़ता है और कई बार तो पशु दूध देना ही बंद कर देता है। इस आर्टिकल में आपको आज इस रोग के होने पर दिखने वाले लक्षण और उसका इलाज के बारे में विस्तार से बतायेंगे।

खुरपका-मुंहपका रोग के लक्षण क्या होते है

आपके पशु में अगर खुरपका-मुंहपका रोग हो गया है तो आपको आसानी से पता चल जायेगा। जब पशु में खुरपका-मुंहपका रोग होता है तो पशु चारा खाना बंद कर देता है। पशु के मुंह के आसपास और अंदर छोटे छोटे गोल आकार के छाले नजर आने लगते है जो बहुत दर्दनाक होते है। पशु को इन छालों की वजह से चरने में दिक्कत होने लगती है।

इसके साथ ही पशुओं के खुर के पास भी ऐसी तरफ के छाले होते है जो घाव का रूप ले लेते है और इसके कारण पशु को चलने फिरने में दिक्कत होने लगती है। इस रोग के कारण पशु बहुत कमजोर हो जाता है और कई महीनो तक पशु इससे रिकवर नहीं हो पाता। मुंह में छालों के कारण पशु जुगाली भी नहीं कर पाता और लगातार पशु के मुंह से लार पटकती रहती है।

पशुओं में पशुपालन करने वाले भाइयों को ये ध्यान देना है की अगर आपका पशु गाभिन है और ऐसे में उसको मुंहपका खुरपका की बीमारी हो जाती है तो फिर ये एक गंभीर रोग हो सकता है क्योंकि पशु का गर्भपात तक भी इस बीमारी के कारण हो सकता है।

मुंहपका खुरपका बीमारी का ईलाज कैसे करें

सबसे पहले तो हम आपको ये कहेंगे की अपने पशु का नियमित रूप से टीकाकरण जरूर करवाये क्योंकि इस बीमारी का टिका ही एकमात्र सबसे अच्छे उपाय है। इसलिए रोग के बारे में पता चलते है डॉक्टर को बुलाकर उनकी सलाह के अनुसार ही कार्य करें।

इसके अलावा आप कुछ देशी तरीकों से भी इस रोग को फैलने से और पशु को कुछ रहत भी दे सकते है। पशु के खुरों में जहाँ पर घाव हो गए है उन स्थानों को नीम की पत्तियों के रास वाले पानी से सफाई करें। इसके अलावा पशु के मुंह में जंहा जहां छाले हो रखे है उन स्थानों पर पीपल की पेड़ की छाल को घिसकर उसका लेप करें।

अगर नीम के पत्तों का इंतजाम नहीं हो पाता है तो आप फिनाईल का उपयोग भी पशु के पैरों की सफाई की लिए कर सकते है। आपको रोजाना दिन में तीन से चार बार इसको करना है। इससे पशु को बहुत अधिक रहत मिलेगी और रोग को आगे बढ़ने से उसकी रोकथाम में भी मदद मिलेगी। कुछ दिन में ही पशु खाना शुरू कर देगा।

इसके अलावा फिटकरी को पानी में घोलकर भी आप पशु के मुंह और खुर की सफाई कर सकते है। इस बीमारी में पशु खाना ठीक से नहीं खा पाता इसलिए नरम खाना पशु को दें जो की आसानी से पच जाए। पशु जुगाली भी नहीं कर पाता इसलिए नरम खाने को पचाने में पशु को ज्यादा दिक्कत नहीं होगी।

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कविता यादव एन एफ एल स्पाइस वेबसाइट पर गैस्ट के रूप में आर्टिकल लिखती है। हालांकि इनके आर्टिकल आपको कभी कभी पढ़ने को मिलते है क्योंकि ये किसी दूसरी न्यूज़ एजेंसी के साथ में काम करती है। शानवी वेब मीडिया के साथ में इनको काम करना अच्छा लगता है इसलिए कभी कभी एन एफ एल स्पाइस पर अपने लिखने की कला की छाप छोड़ देती है।
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