चंडीगढ़/पंचकूला: पर्यावरण संरक्षण को लेकर पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने एक ऐसा कड़ा फैसला सुनाया है, जिसकी गूंज पूरे प्रदेश में सुनाई दे रही है।
बुधवार को एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए चीफ जस्टिस शील नागू की बेंच ने हरियाणा में पेड़ों की कटाई पर तत्काल प्रभाव से पूरी तरह रोक लगा दी है।
अब पूरे राज्य में किसी भी सरकारी या निजी प्रोजेक्ट के लिए पेड़ काटने से पहले अदालत की अनुमति लेना अनिवार्य होगा।
खतरे की घंटी: देश में सबसे कम है हरियाणा का वन क्षेत्र
सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने प्रदेश की हरियाली को लेकर बेहद तल्ख टिप्पणी की। कोर्ट ने गहरी चिंता जताते हुए कहा कि हरियाणा में ‘फॉरेस्ट कवर’ (वन क्षेत्र) देश के सबसे निचले स्तर पर पहुंच चुका है।
यह स्थिति न केवल चिंताजनक है, बल्कि एक गंभीर पर्यावरणीय संकट की ओर इशारा करती है। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि विकास के नाम पर अब प्रकृति की बलि चढ़ाना बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
क्या है पूरा मामला?
यह पूरा विवाद जीरकपुर-पंचकूला कंट्रोल्ड हाईवे परियोजना से जुड़ा है। इस प्रोजेक्ट के लिए लगभग 17.57 हेक्टेयर वन भूमि को डायवर्ट करने और करीब 5000 पुराने पेड़ों को काटने की योजना थी।
याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि यह इलाका ट्राइसिटी (चंडीगढ़, पंचकूला, मोहाली) का ‘ग्रीन लंग’ (फेफड़ा) है।
अगर यहां के पंचकूला गोल्फ कोर्स और घग्गर नदी के किनारे वाले वन क्षेत्र को उजाड़ा गया तो ट्राइसिटी की हवा जहरीली हो जाएगी और जैव विविधता पूरी तरह खत्म हो जाएगी।
सरकार को सख्त संदेश
कोर्ट के इस फैसले ने हरियाणा सरकार और संबंधित विभागों को सकते में डाल दिया है। याचिका में दावा किया गया था कि यह हाईवे प्रोजेक्ट ट्राइसिटी के पर्यावरणीय संतुलन के लिए बड़ा खतरा साबित हो सकता है।
अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए न केवल इस प्रोजेक्ट पर स्टे लगाया बल्कि इसे पूरे हरियाणा पर लागू कर दिया है। अब सरकार को अपनी हर योजना में पर्यावरण को पहली प्राथमिकता देनी होगी।

