अंबेडकरनगर। आप सभी कल्पना कीजिए एक डेढ़ साल का नन्हा सा बच्चा जो अभी-अभी दुनिया को अपनी मुस्कान से रंग रहा था ओर वो अचानक सांस लेने में तकलीफ महसूस करने लगा।
रोता, चिड़चिड़ाता लेकिन मां-बाप को समझ नहीं आता कि असली वजह क्या है। उसी घर के कोने में पड़ा एक मामूली सा टूथब्रश उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा खतरा बन गया।
यह कोई फिल्मी कहानी नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश के अंबेडकरनगर जिले के फूलवारी गांव की सच्ची घटना है।
घटना का वो पल जो बदल गया सब कुछ
जानकारी के अनुसार 4 मई का दिन था। गोविंद कुमार (30) और उनकी पत्नी रुपम (28) के घर में छोटा आयु खेल रहा था। मोबाइल कंपनी में काम करने वाले गोविंद उस वक्त शायद काम की चिंता में थे, जबकि रुपम घरेलू जिम्मेदारियों में व्यस्त थीं। बच्चा टूथब्रश के साथ खेलते-खेलते गिर पड़ा।
मुंह के बल गिरने की वजह से ब्रश का 2 इंच लंबा हिस्सा उसके नासोफैरिंक्स (नाक और गले के बीच) में फंस गया। बच्चा रोया लेकिन मां ने सोचा शायद गिरने से चोट लगी है।
अगले दिन पड़ोस के डॉक्टर के पास ले गए। सूजन बताया गया। दवाइयां चलीं। दिन बीतते गए बच्चे में जुकाम-बुखार बढ़ा, खाना-पीना मुश्किल होता गया। लेकिन कोई नहीं जानता था कि छोटे से ब्रश ने बच्चे की सांस की नली को लगभग बंद कर रखा है।
आपको जानकर हैरानी होगी कि बच्चा 23-25 दिनों तक आयु खाने की नली से ही सांस लेता रहा। टूथब्रश के चारों ओर मांस की परत (ग्रैनुलेशन टिश्यू) बन गई थी जो ऑपरेशन को और जटिल बना रही थी।
जब हकीकत सामने आई तो दिल दहल गया
परिवार जब अंततः महामाया राजकीय मेडिकल कॉलेज पहुंचा तो डॉक्टरों ने तुरंत सीटी स्कैन कराया। रिपोर्ट देखकर सभी स्तब्ध रह गए।
ईएनटी विभाग के प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष डॉ. प्रमोद यादव ने बताया कि लंबे समय तक विदेशी वस्तु फंसी रहने से ऊतकों में सूजन और संक्रमण हो जाता है। बच्चे की छाती में भी इंफेक्शन फैल चुका था।
टीम वर्क और मेडिकल चमत्कार
शुक्रवार को डॉक्टरों की एक मजबूत टीम ने चुनौतीपूर्ण ऑपरेशन किया। डॉ. प्रमोद यादव के नेतृत्व में एनेस्थीसिया विभाग के डॉ. संदीप यादव, डॉ. मिनाली और डॉ. सुदीप ने एंडोस्कोपी के जरिए ब्रश को सफलतापूर्वक बाहर निकाला। ऑपरेशन के दौरान बच्चे की नाजुक हालत को देखते हुए हर कदम सावधानी से उठाया गया।
मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. मुकेश यादव ने पूरी टीम को बधाई देते हुए कहा कि यह सिर्फ एक सर्जरी नहीं बल्कि सामूहिक समर्पण और पेशेवर कौशल का नतीजा है।
ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसी जटिल घटनाओं का सफल इलाज हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था की ताकत दिखाता है।
मां-बाप की आंखों में अब राहत के आंसू
आयु को फिलहाल 48 घंटे निगरानी में रखा गया है। परिवार की खुशी लौट रही है लेकिन इस घटना ने एक बड़ा सबक भी दिया है।
छोटे बच्चों को हर वक्त नजर में रखना कितना जरूरी है। घर में पड़ी कोई भी छोटी वस्तु चाहे टूथब्रश हो, सिक्का हो या खिलौने का पार्ट इनमें कोई भी बच्चों के लिए जानलेवा साबित हो सकती है।
बच्चों की सुरक्षा पर चिंता लाजमी है
यह घटना अकेली नहीं है। देशभर में हर साल हजारों बच्चे छोटी-छोटी वस्तुएं निगलने के मामलों में अस्पताल पहुंचते हैं।
WHO के आंकड़ों के अनुसार 5 साल से कम उम्र के बच्चों में विदेशी वस्तु निगलने की घटनाएं आम हैं खासकर खेलते समय। अंबेडकरनगर जैसे जिले में जहां स्वास्थ्य सुविधाएं लगातार बेहतर हो रही हैं वहां डॉक्टरों की इस सफलता ने नई उम्मीद जगाई है।
