WEF Energy Transition Index 2026: दुनिया भर में स्वच्छ और टिकाऊ ऊर्जा (Sustainable Energy) की ओर बढ़ने की कोशिशों को झटका लगा है। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (WEF) की ताजा Energy Transition Index (ETI) 2026 रिपोर्ट के मुताबिक, रिकॉर्ड निवेश के बावजूद ऊर्जा परिवर्तन (Energy Transition) की वैश्विक रफ्तार लगभग ठहर सी गई है।
रिपोर्ट में 120 देशों का आकलन किया गया है। इसमें भारत को प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के बीच संक्रमण तैयारी (Transition Readiness) के मामले में अपेक्षाकृत मजबूत प्रदर्शन करने वाला देश बताया गया है। ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security) और ऊर्जा की किफायती उपलब्धता (Affordability) बढ़ाने के लिए किए गए निवेश को इसकी प्रमुख वजह माना गया है।
रिकॉर्ड निवेश के बावजूद सीमित प्रगति
रिपोर्ट के अनुसार 2026 में वैश्विक ऊर्जा निवेश 3.3 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गया। इसमें से 2.3 ट्रिलियन डॉलर स्वच्छ ऊर्जा परियोजनाओं पर खर्च किए गए। इसके बावजूद ETI स्कोर में केवल 0.03 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज हुई।
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WEF का कहना है कि 2026 में होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से जुड़े व्यवधान, बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव, ऊर्जा मांग में वृद्धि और कुछ चुनिंदा देशों तक निवेश सीमित रहने जैसे कारणों ने प्रगति को प्रभावित किया। इससे आगे बढ़ रहे और पीछे छूट रहे देशों के बीच अंतर और बढ़ गया।
ऊर्जा सुरक्षा में गिरावट चिंता का विषय
रिपोर्ट के मुताबिक सिस्टम प्रदर्शन (System Performance) में औसतन 0.43 प्रतिशत सुधार हुआ। ऊर्जा की उपलब्धता और वहनीयता में सुधार से इक्विटी (Equity) स्कोर 1.6 प्रतिशत बढ़ा, जबकि स्वच्छ ऊर्जा हिस्सेदारी और ऊर्जा दक्षता (Energy Efficiency) में प्रगति के चलते स्थिरता (Sustainability) में 0.6 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।
हालांकि ऊर्जा सुरक्षा एकमात्र ऐसा क्षेत्र रहा जिसमें गिरावट देखी गई। यह 0.9 प्रतिशत नीचे गया। इसके पीछे आयात स्रोतों में विविधता की कमी और बिजली ग्रिड की विश्वसनीयता में कमजोरी को कारण बताया गया है।
रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि 2026 में केवल 24 प्रतिशत देश ही ऊर्जा प्रदर्शन के तीनों प्रमुख मानकों पर एक साथ सुधार कर सके। पिछले वर्ष यह आंकड़ा 28 प्रतिशत था।
एक दशक में पहली बार घटी तैयारी
ऊर्जा परिवर्तन की तैयारी को लेकर स्थिति और चुनौतीपूर्ण रही। रिपोर्ट के अनुसार ट्रांजिशन रेडीनेस में कुल 0.76 प्रतिशत की गिरावट आई, जो पिछले दस वर्षों में पहली बार दर्ज की गई है।
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वित्त और निवेश (Finance and Investment) क्षेत्र में सबसे बड़ी 1.8 प्रतिशत गिरावट देखी गई। रिपोर्ट बताती है कि स्वच्छ ऊर्जा निवेश का 75 प्रतिशत हिस्सा अभी भी कुछ सीमित बाजारों तक केंद्रित है। वहीं भविष्य में ऊर्जा मांग बढ़ाने वाले देशों को विकसित अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में दो से तीन गुना अधिक वित्तीय लागत का सामना करना पड़ रहा है।
नवाचार (Innovation) में 1.1 प्रतिशत और नियामकीय एवं राजनीतिक प्रतिबद्धता (Regulation and Political Commitment) में 1.2 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई। दूसरी ओर शिक्षा और मानव पूंजी (Human Capital) ही ऐसा क्षेत्र रहा जिसमें 2 प्रतिशत का सुधार हुआ।
रिपोर्ट ने यह भी बताया कि दुनिया भर में 2,500 गीगावाट से अधिक नवीकरणीय ऊर्जा (Renewable Energy) परियोजनाएं ग्रिड कनेक्शन की प्रतीक्षा में अटकी हुई हैं।
रैंकिंग में भारत की स्थिति
ऊर्जा परिवर्तन सूचकांक में विकसित देशों का दबदबा बना रहा। शीर्ष 20 में से 14 स्थान उन्नत अर्थव्यवस्थाओं के पास रहे। स्वीडन लगातार तीसरे वर्ष पहले स्थान पर रहा।
प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में चीन 14वें स्थान पर रहा, जबकि नीति संबंधी अनिश्चितताओं के बीच अमेरिका 19वें स्थान पर दर्ज हुआ। भारत इस सूची में 70वें स्थान पर रहा, लेकिन रिपोर्ट ने उसे ऊर्जा परिवर्तन की तैयारी के मामले में प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के बीच अपेक्षाकृत मजबूत प्रदर्शन करने वाला देश माना है।
आगे के लिए क्या सुझाया गया?
रिपोर्ट ने ऊर्जा परिवर्तन की गति बनाए रखने के लिए तीन प्रमुख प्राथमिकताएं सुझाई हैं। इनमें ऊर्जा सुरक्षा, किफायती व्यवस्था और लचीलेपन (Resilience) को ऊर्जा प्रणाली का स्थायी हिस्सा बनाना, बिजली ग्रिड विस्तार और परियोजना मंजूरी प्रक्रियाओं को तेज करना तथा उभरती अर्थव्यवस्थाओं तक निवेश पहुंचाने के लिए स्थिर नीतियां और बेहतर पूंजी प्रवाह सुनिश्चित करना शामिल है।
ऊर्जा क्षेत्र में निवेश लगातार बढ़ रहा है लेकिन WEF की यह रिपोर्ट संकेत देती है कि केवल निवेश बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। वैश्विक स्तर पर नीतिगत स्थिरता, बुनियादी ढांचे का विस्तार और निवेश का संतुलित वितरण आने वाले वर्षों में निर्णायक भूमिका निभा सकता है।
