शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2026

फिनलैंड में बोले एस जयशंकर: यूरोप बेचता है भारत विरोधी हथियार, रूसी तेल पर फिनिश विदेश मंत्री ने किया नई दिल्ली का बचाव

Written by: Vinod Yadav

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Jaishankar Finland Russian Oil: फिनलैंड में विदेश मंत्रियों की बैठक के दौरान एस जयशंकर ने पश्चिमी देशों के दोहरे रवैये पर तीखा प्रहार किया, जिसके बाद फिनिश विदेश मंत्री ने भारत का बचाव किया।


फिनलैंड में बोले एस जयशंकर: यूरोप बेचता है भारत विरोधी हथियार, रूसी तेल पर फिनिश विदेश मंत्री ने किया नई दिल्ली का बचाव
फिनलैंड में बोले एस जयशंकर: यूरोप बेचता है भारत विरोधी हथियार, रूसी तेल पर फिनिश विदेश मंत्री ने किया नई दिल्ली का बचाव
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Jaishankar Finland Russian Oil: फिनलैंड के राष्ट्रपति आवास कुल्तारांता में आयोजित विदेश मंत्रियों की उच्चस्तरीय बैठक अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के एक बड़े सियासी अखाड़े में तब्दील हो गई। भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने यूक्रेन युद्ध के बाद से लगातार रूसी तेल खरीद को लेकर सवाल उठाने वाले पश्चिमी देशों को उनकी ही सरजमीं पर कड़ा आईना दिखाया है।

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भारतीय विदेश मंत्री ने दोटूक लहजे में साफ किया कि भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा, बाजार में तेल की उपलब्धता और आर्थिक लागत के आधार पर ही फैसले लेता है, न कि किसी भू-राजनीतिक दबाव में।

इस तीखी कूटनीतिक बहस के बीच एक बेहद चौंकाने वाला और सकारात्मक मोड़ तब आया, जब मेजबान देश फिनलैंड की विदेश मंत्री एलिना वाल्तोनेन ने भारतीय रुख का खुलकर समर्थन किया।

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फिनलैंड विदेश मंत्री ने रूसी तेल खरीदने के नई दिल्ली के फैसले का बचाव करते हुए साफ किया कि भारत ने अंतरराष्ट्रीय नियमों या किसी भी तरह के प्रतिबंधों का उल्लंघन नहीं किया है।

प्राइस कैप के दायरे में रहकर खरीदा तेल, फिनलैंड ने समझाया प्रतिबंधों का असली गणित

बैठक के दौरान पश्चिमी मीडिया और कुछ देशों द्वारा उठाए गए कड़े सवालों का जवाब खुद फिनलैंड की विदेश मंत्री एलिना वाल्तोनेन ने दिया। उन्होंने वैश्विक प्रतिबंधों की बारीकियों को स्पष्ट करते हुए भारत के रुख को पूरी तरह वैध ठहराया।

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फिनिश विदेश मंत्री ने प्रतिबंधों के मूल उद्देश्य को रेखांकित करते हुए कहा:

  • दुनिया को तेल खरीदने से नहीं रोका: जब पश्चिमी देशों ने रूसी कच्चे तेल पर ‘प्राइस कैप’ (मूल्य सीमा) लागू की थी, तब वैश्विक बाजार को रूस से तेल की आपूर्ति पूरी तरह बंद करने का निर्देश नहीं था।

  • उद्देश्य के तहत हुई खरीदारी: भारत के पक्ष में सबसे मजबूत बात यह है कि उसने तय सीमा और नियमों के भीतर रहकर ही रूसी तेल की खरीद की है। पश्चिमी देशों की नीति का उद्देश्य भी यही था कि वैश्विक तेल बाजार में आपूर्ति बनी रहे और रूस को अत्यधिक मुनाफा न हो, जिसमें भारत का रुख पूरी तरह फिट बैठता है।

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पारंपरिक सप्लायरों पर यूरोप ने जमाया कब्जा, तो भारत के पास क्या विकल्प था?

इस बैठक के दौरान जब एक पत्रकार ने भारत पर रूस के प्रति जरूरत से ज्यादा सहानुभूति रखने और रूसी तेल के प्रति विशेष झुकाव होने का आरोप लगाया, तो विदेश मंत्री एस जयशंकर ने अपनी चिरपरिचित शैली में करारा जवाब दिया। उन्होंने वैश्विक तेल बाजार की जमीनी हकीकत को सबके सामने रखा।

बाजार का समीकरण

भारतीय विदेश मंत्री ने स्पष्ट किया कि युद्ध शुरू होने के बाद यूरोपीय देशों ने अचानक मध्य-पूर्वी (मिडिल-ईस्ट) देशों से तेल खरीदना शुरू कर दिया था, जो पारंपरिक रूप से भारत के मुख्य सप्लायर थे।

जब यूरोप ने भारत के बाजार स्रोतों पर कब्जा कर लिया, तो भारत के सामने अपनी विशाल आबादी की जरूरतों को पूरा करने के लिए तत्कालीन बाजार में उपलब्ध रूसी तेल की तरफ बढ़ने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था।

“यूरोप ऐसे हथियार बेचता है जिससे भारत पर हमले होते हैं”

पश्चिमी देशों के दोहरे मापदंडों पर प्रहार करते हुए एस जयशंकर ने सुरक्षा के मोर्चे पर यूरोप की दुखती रग पर हाथ रख दिया। उन्होंने याद दिलाया कि इतिहास में कभी भी किसी यूरोपीय देश पर भारत की धरती या भारत के निर्मित हथियारों से कोई हमला नहीं हुआ है, लेकिन दुर्भाग्य से यूरोप के संदर्भ में ऐसा नहीं कहा जा सकता।

भारतीय विदेश मंत्री ने सख्त लहजे में कहा कि यूरोप लगातार ऐसे घातक हथियारों की सप्लाई और बिक्री करता रहा है, जिनका सीधा इस्तेमाल भारत की संप्रभुता के खिलाफ और भारत पर हमलों के लिए किया गया है।

उन्होंने साफ किया कि भारतीय समाज और सरकार ने कभी भी यूरोप के लिए कोई सुरक्षा खतरा पैदा नहीं किया, इसलिए भारत को कूटनीतिक उपदेश देना बंद होना चाहिए।

क्या है रूसी तेल पर लगे प्रतिबंधों और प्राइस कैप का पूरा विवाद?

इस पूरे विवाद की जड़ें फरवरी 2022 में शुरू हुए रूस-यूक्रेन सैन्य संघर्ष से जुड़ी हैं। युद्ध छिड़ने के बाद अमेरिका और यूरोपीय संघ ने मॉस्को की आर्थिक रीढ़ को तोड़ने के लिए उसके कच्चे तेल के निर्यात पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए थे।

रूस को तेल से होने वाली मोटी कमाई को रोकने के लिए पश्चिमी देशों ने 5 दिसंबर 2022 को एक विशेष ‘प्राइस कैप’ नीति की घोषणा की थी।

इस अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के तहत रूसी कच्चे तेल की कीमत को अधिकतम 60 डॉलर प्रति बैरल पर फ्रीज कर दिया गया था। नियम यह था कि इस तय कीमत से अधिक पर तेल खरीदने वाले देशों को पश्चिमी जहाजरानी (शिपिंग) और बीमा सेवाओं का लाभ नहीं मिलेगा।

भारत ने इस पूरे संकट के दौरान चतुर कूटनीति का परिचय देते हुए न केवल अपने आर्थिक हितों की रक्षा की, बल्कि अंतरराष्ट्रीय नियमों के दायरे में रहकर देश में ईंधन की कीमतों को भी नियंत्रित रखने में सफलता हासिल की।

Vinod Yadav
About the Author Vinod Yadav

नमस्कार! मेरा नाम विनोद यादव है और मैंने कृषि और टेक्सटाइल विषय के साथ में बी-टेक किया है। मौजूदा समय में एक जर्मनी बेस्ड टेक्सटिल कंपनी में प्रोडक्शन हेड के तौर पर कार्य कर रहा हूँ और साथ में कृषि के कार्यों को देखता हूँ। किसान परिवार में पैदा होने के चलते कृषि से शुरू से ही एक अलग प्रकार का जुड़ाव रहा है। रोजाना यहां हरियाणा से जुड़ी और हरियाणा प्रदेश के किसानों से जुड़ी ख़बरों को अपडेट करता हूँ। View all posts by Vinod Yadav →

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