रेवाड़ी: हरियाणा की वीरधरा और रेवाड़ी जिले के नाम खेल जगत में एक और स्वर्णिम और ऐतिहासिक वैश्विक उपलब्धि जुड़ गई है। रेवाड़ी के सेक्टर-4 में संचालित प्रतिष्ठित 'राव शूटिंग अकादमी' के मुख्य कोच और संचालक रमन राव ने इंटरनेशनल शूटिंग स्पोर्ट फेडरेशन (ISSF) का बेहद कठिन और प्रतिष्ठित 'बी लाइसेंस कोच कोर्स' सफलतापूर्वक पूरा कर लिया है। इस वैश्विक स्तर के कोर्स की सबसे खास बात यह रही कि पूरी दुनिया के अलग-अलग महाद्वीपों और देशों से चयनित किए गए महज 21 शीर्ष शूटिंग कोचों में रमन राव ने भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए अपनी जगह पक्की की थी।

इस ऐतिहासिक कामयाबी के बाद अब रमन राव अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किसी भी देश की राष्ट्रीय या ओलंपिक शूटिंग टीम को मुख्य कोच के रूप में ट्रेनिंग और रणनीतिक मार्गदर्शन देने के लिए पूरी तरह से अधिकृत हो गए हैं। इस खबर के सामने आते ही रेवाड़ी के खेल प्रेमियों, युवा निशानेबाजों और उनके परिवार में जश्न का माहौल है।

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तीन कड़े और वैज्ञानिक चरणों में पूरा होता है यह अंतरराष्ट्रीय कोर्स 

कोच रमन राव ने अपनी इस दो साल की लंबी और चुनौतीपूर्ण यात्रा के तकनीकी पहलुओं को साझा करते हुए बताया कि इंटरनेशनल शूटिंग स्पोर्ट फेडरेशन (ISSF) की कोचिंग प्रणाली बेहद वैज्ञानिक और कड़े मापदंडों पर आधारित होती है। यह पूरा कोर्स मुख्य रूप से तीन अलग-अलग प्रगतिशील स्तरों में विभाजित होता है:

  • पहला चरण (डी कोर्स): शुरुआत में फेडरेशन द्वारा कोचों के ट्रैक रिकॉर्ड को देखकर 'डी कोर्स' के लिए उनका बेस लेवल टेस्ट लिया जाता है।

  • दूसरा चरण (सी कोर्स): डी कोर्स को सफलतापूर्वक उत्तीर्ण करने के बाद नेशनल फेडरेशन की सिफारिश पर 'सी कोर्स' के एडवांस मॉड्यूल के लिए नामांकन किया जाता है।

  • अंतिम चरण (बी कोर्स): सी कोर्स पास करने के बाद सबसे कठिन 'बी कोर्स' की बारी आती है। इसमें केवल उन्हीं कोचों को प्रवेश की अनुमति दी जाती है जिनकी न केवल खेलों में गहरी रुचि हो, बल्कि वे खेल विज्ञान, निशानेबाजों के मानसिक दबाव प्रबंधन और बायोमैकेनिक्स के विशेष शोध (Research Fields) क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य कर रहे हों। रमन राव पिछले दो सालों से इन सभी कठिन चरणों को एक-एक कर पार कर रहे थे।

दिल्ली के फाइव स्टार होटल में आयोजित हुआ भव्य दीक्षांत समारोह 

इस प्रतिष्ठित कोर्स के अंतिम और निर्णायक चरण का समापन देश की राजधानी नई दिल्ली के लुटियंस जोन में स्थित फाइव स्टार ताज होटल में एक बेहद भव्य दीक्षांत समारोह के साथ हुआ। इस उच्च स्तरीय खेल कार्यक्रम में इंटरनेशनल शूटिंग स्पोर्ट फेडरेशन (ISSF) की अकादमी के शीर्ष वैश्विक निदेशक, अंतरराष्ट्रीय स्तर के खेल विशेषज्ञ और भारत के जाने-माने दिग्गज ओलंपियन शूटर संजीव राजपूत विशेष रूप से उपस्थित रहे।

इस गौरवमयी मंच पर ISSF शूटिंग स्पोर्ट्स फेडरेशन अकादमी के वैश्विक डायरेक्टर वैसा निशियन ने कोच रमन राव को उनकी असाधारण थ्योरी और प्रैक्टिकल रिसर्च के लिए 'बी लाइसेंस कोच' के आधिकारिक डिप्लोमा और प्रमाण-पत्र से सम्मानित किया।

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ओलंपिक स्तर की टीमों को अंतरराष्ट्रीय कोचिंग देने की मिली पात्रता 

निशानेबाजी के वैश्विक नियमों के अनुसार, ओलंपिक खेल, एशियाई खेल (Asian Games) या आईएसएसएफ वर्ल्ड कप जैसे बड़े मंचों पर किसी भी देश की आधिकारिक राष्ट्रीय शूटिंग टीम के साथ मुख्य कोच या सपोर्ट स्टाफ के रूप में काम करने के लिए इस 'बी लाइसेंस' का होना एक अनिवार्य वैधानिक योग्यता माना जाता है।

रमन राव ने बताया कि भारतीय राइफल संघ (NRAI) ने उनके पिछले 10 सालों के कोचिंग करियर और उनकी अकादमी से निकले कई नेशनल-इंटरनेशनल स्तर के निशानेबाजों के प्रदर्शन को देखते हुए उनके नाम की सिफारिश सीधे इंटरनेशनल फेडरेशन को भेजी थी। इस लाइसेंस के मिलने के बाद अब वे भारतीय सीनियर या जूनियर नेशनल टीम के साथ-साथ दुनिया के किसी भी अन्य देश की ओलंपिक शूटिंग टीम को भी कोचिंग देने के लिए पूरी तरह योग्य हो गए हैं।

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SAI और ओलंपिक गोल्ड क्वेस्ट ने उठाया पूरे कोर्स का खर्च 

इस अंतरराष्ट्रीय प्रशिक्षण और प्रमाणन प्रक्रिया के दौरान होने वाले भारी-भरकम वित्तीय खर्च को लेकर भी रमन राव ने देश की खेल प्रणालियों की सराहना की। उन्होंने जानकारी दी कि इस वैश्विक कोर्स का पूरा रणनीतिक और प्रशासनिक खर्च संयुक्त रूप से नेशनल राइफल एसोसिएशन ऑफ इंडिया (NRAI), भारतीय खेल प्राधिकरण (SAI) और देश में एथलीटों को ओलंपिक के लिए तैयार करने वाली विख्यात संस्था 'ओलंपिक गोल्ड क्वेस्ट' (OGQ) द्वारा वहन किया गया है।

रमन राव ने इस अभूतपूर्व वित्तीय और प्रशासनिक सहयोग के लिए भारतीय राइफल संघ, भारत सरकार के खेल मंत्रालय और आईएसएसएफ अकादमी का सहृदय आभार व्यक्त किया। उन्होंने संकल्प लिया कि उनका मुख्य फोकस अब ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों के युवा निशानेबाजों को विश्व स्तरीय आधुनिक तकनीक प्रदान करना है ताकि वे 2028 और 2032 के ओलंपिक खेलों में भारत के लिए स्वर्ण पदक जीत सकें।