रेवाड़ी: नई दिल्ली, 26 सितंबर: भारतीय संसद के भीतर सरकार और विपक्ष के बीच जारी तीखी राजनीतिक रस्साकशी के बीच संख्या बल का गणित एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गया है। राजनीतिक हलकों में संवैधानिक पदों पर बैठे पदाधिकारियों के खिलाफ महाभियोग (Impeachment Motion) लाने की संभावनाओं पर बहस छिड़ी हुई है। विपक्ष के राष्ट्रीय संगठन यानी इंडिया गठबंधन (INDIA Alliance) के पास इस समय संसद के दोनों सदनों में इतनी संख्या जरूर है कि वह किसी भी महाभियोग प्रस्ताव का नोटिस दे सके, लेकिन इसे संसद से पारित कराना मौजूदा राजनीतिक आंकड़ों के लिहाज से लगभग नामुमकिन नजर आता है।
संसद में क्या है इंडिया गठबंधन का संख्या बल?
मीडिया रिपोर्ट्स और संसदीय आंकड़ों के मुताबिक, वर्तमान में लोकसभा में इंडिया गठबंधन के पास 199 सांसद हैं, जबकि राज्यसभा में यह आंकड़ा 62 सांसदों का है। भारतीय संविधान और न्यायाधीश (जांच) अधिनियम के तहत किसी भी जज या संवैधानिक पदाधिकारी के खिलाफ महाभियोग प्रक्रिया शुरू करने के लिए लोकसभा के कम से कम 100 या राज्यसभा के 50 सांसदों के हस्ताक्षरित नोटिस की जरूरत होती है। चूंकि विपक्ष के पास दोनों ही सदनों में तय सीमा से कहीं अधिक सांसद हैं, इसलिए वे तकनीकी तौर पर नोटिस देने की क्षमता रखते हैं।
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नोटिस देना आसान, लेकिन पास कराना क्यों है बड़ी चुनौती?
संसदीय नियमों के विशेषज्ञ और कानूनी विश्लेषकों के अनुसार, केवल नोटिस देने मात्र से किसी को पद से नहीं हटाया जा सकता। असली परीक्षा सदन के भीतर वोटिंग के समय होती है। संविधान के मुताबिक, महाभियोग प्रस्ताव को पारित करने के लिए संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत (Special Majority) की आवश्यकता होती है।
इसका मतलब यह है कि सदन की कुल सदस्यता का पूर्ण बहुमत और मतदान करने वाले सांसदों का कम से कम दो-तिहाई (2/3) समर्थन प्रस्ताव के पक्ष में होना अनिवार्य है। मौजूदा 543 सदस्यों वाली लोकसभा में दो-तिहाई का आंकड़ा जुटाने के लिए कम से कम 362 वोटों की जरूरत होगी, जिससे विपक्ष (199 सांसद) अभी बहुत दूर है।
अध्यक्ष और सभापति के पास होती है वीटो पावर
संसदीय इतिहास गवाह है कि सांसदों के हस्ताक्षर वाला नोटिस मिलने के बाद भी अंतिम फैसला लोकसभा अध्यक्ष (स्पीकर) या राज्यसभा के सभापति (उपराष्ट्रपति) के हाथ में होता है। उन्हें यह अधिकार है कि वे प्रारंभिक तथ्यों को देखने के बाद इस नोटिस को स्वीकार करें या खारिज कर दें।
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इससे पहले भी साल 2018 में कांग्रेस सहित विपक्षी दलों ने तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ राज्यसभा सभापति को 60 से अधिक सांसदों के हस्ताक्षर वाला नोटिस सौंपा था, जिसे विधिक आधार न होने का हवाला देकर खारिज कर दिया गया था।
आम जनता और राज्यों की राजनीति पर असर
संसद के भीतर चलने वाले इस संख्या बल के खेल का सीधा असर हरियाणा (रेवाड़ी, महेंद्रगढ़, नारनौल) और राजस्थान जैसे राज्यों की स्थानीय राजनीति पर भी पड़ता है। जब दिल्ली में राष्ट्रीय दल इस तरह की कानूनी घेराबंदी की रणनीति बनाते हैं, तो राज्यों में क्षेत्रीय समीकरण (जैसे जजपा, इनेलो या स्थानीय निर्दलीय गुट) भी अपनी गोटियां सेट करने लगते हैं।
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आम नागरिकों के लिए इसका सीधा मतलब यह है कि आने वाले दिनों में विधायी कामकाज में तेजी के बजाय दोनों पक्षों के बीच तीखी राजनीतिक तकरार देखने को मिल सकती है, जिससे विकास से जुड़े बिलों पर चर्चा टल सकती है।
आगे क्या हो सकता है?
आंकड़ों की इस विवशता को देखते हुए साफ है कि विपक्षी खेमा महाभियोग को एक विधिक हथियार के बजाय एक 'राजनीतिक दबाव' बनाने के टूल के रूप में इस्तेमाल कर सकता है। अगर विपक्ष किसी मुद्दे पर नोटिस टेबल करता भी है, तो सत्ता पक्ष अपने सहयोगियों के साथ मिलकर इसे आसानी से गिरा देगा। आने वाले सत्रों में यह देखना दिलचस्प होगा कि इंडिया गठबंधन इस संख्या बल के साथ सदन के भीतर सरकार को घेरने के लिए क्या नई रणनीति अपनाता है।







