India Myanmar Relations: भारत और उसके पड़ोसी देश म्याँमार के बीच द्विपक्षीय संबंधों को एक नई ऊर्जा और रणनीतिक मजबूती देने के लिए नई दिल्ली के हैदराबाद हाउस में एक बेहद महत्वपूर्ण बैठक संपन्न हुई है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और म्याँमार के राष्ट्रपति यू मिन आंग ह्लाइंग के बीच सोमवार को हुई इस उच्च स्तरीय वार्ता में सुरक्षा सहयोग, साइबर अपराध, क्रिटिकल मिनरल्स (महत्वपूर्ण खनिज), कनेक्टिविटी और क्षेत्रीय स्थिरता जैसे बेहद संवेदनशील और बड़े मुद्दों पर विस्तृत चर्चा हुई।
यह मुलाकात केवल औपचारिक कूटनीति का हिस्सा नहीं थी, बल्कि इसका सीधा सरोकार उन हजारों भारतीय परिवारों से है जिनके बच्चे विदेशों में नौकरी के नाम पर साइबर ठगी के जाल में फंस रहे हैं। दोनों देशों ने इस बात पर जोर दिया कि सीमाओं की सुरक्षा और नागरिकों की हिफाजत के लिए आपसी तालमेल को अब एक नए स्तर पर ले जाना बेहद जरूरी हो चुका है।
म्याँमार के साइबर स्कैम नेटवर्क पर भारत सख्त
इस द्विपक्षीय बैठक के दौरान भारत ने म्याँमार के सीमावर्ती इलाकों में सक्रिय ‘साइबर स्कैम नेटवर्क्स’ (ऑनलाइन ठगी के सिंडिकेट) से पैदा हो रहे गंभीर खतरों का मुद्दा बेहद पुरजोर तरीके से उठाया। भारत ने साफ किया कि इन अवैध नेटवर्क्स को ध्वस्त करने के लिए दोनों देशों को मिलकर एक मजबूत व्यवस्था बनानी होगी।
बैठक के बाद आयोजित एक विशेष प्रेस ब्रीफिंग में विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने इस मोर्चे पर मिली अब तक की कामयाबियों और चुनौतियों का ब्योरा साझा करते हुए बताया:
2,411 भारतीयों की सुरक्षित वापसी: पिछले 18 महीनों के दौरान भारत और म्याँमार की एजेंसियों ने मिलकर काम किया है, जिसके चलते दक्षिण-पूर्वी म्याँमार के अवैध साइबर कैंपों से 2,411 भारतीय नागरिकों को सुरक्षित रेस्क्यू कर स्वदेश वापस लाया जा चुका है।
अभी भी 150 नागरिक फंसे: विदेश सचिव ने बताया कि वर्तमान में भी लगभग 150 से कुछ ज्यादा भारतीय नागरिकों के इन साइबर ठगी केंद्रों में फंसे होने की रिपोर्ट है। सरकार म्याँमार प्रशासन के साथ लगातार संपर्क में है ताकि इन बाकी बचे लोगों को भी जल्द से जल्द सुरक्षित निकाला जा सके।
तीसरे देश के जरिए तस्करी: एक बड़ी चिंता यह सामने आई है कि इन पीड़ितों को सीधे भारत से नहीं, बल्कि किसी तीसरे देश के रास्ते म्याँमार तस्करी (ह्यूमन ट्रैफिकिंग) कर लाया जाता है। यही वजह है कि इसके समाधान के लिए अब द्विपक्षीय बातचीत के साथ-साथ एक बड़े क्षेत्रीय सहयोग की जरूरत महसूस की जा रही है।
व्यापार, रक्षा और सीमा प्रबंधन पर बनी बड़ी सहमति
विदेश मंत्रालय (MEA) के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर इस बैठक को बेहद उत्पादक और भविष्योन्मुखी बताते हुए कहा कि दोनों देशों ने व्यापार, निवेश, क्षमता निर्माण और सीमा प्रबंधन में सहयोग को और गहरा करने पर सहमति जताई है।
चूंकि भारत म्याँमार के साथ 1,643 किलोमीटर लंबी खुली सीमा साझा करता है, इसलिए सीमा पर शांति और सुरक्षा बनाए रखना दोनों ही मुल्कों के हित में सर्वोपरि है।
रक्षा सहयोग के मामले पर विदेश सचिव ने स्पष्ट किया कि भारत और म्याँमार के बीच सैन्य संबंध मुख्य रूप से प्रशिक्षण, क्षमता निर्माण, संस्थागत मजबूती और संयुक्त राष्ट्र (UN) के शांति मिशनों से जुड़े सहयोग पर केंद्रित रहे हैं।
क्रिटिकल मिनरल्स और फेडरल गवर्नेंस पर सहयोग
इस मुलाकात में भविष्य की तकनीक के लिए सबसे जरूरी माने जाने वाले ‘क्रिटिकल मिनरल्स’ और ‘रेयर अर्थ्स’ (दुर्लभ खनिज) के रणनीतिक क्षेत्र में भी आपसी तालमेल बढ़ाने पर गंभीर विमर्श हुआ। दोनों सरकारें इस दिशा में सहयोग की नई संभावनाओं को तलाशने के लिए लगातार संपर्क में रहेंगी।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बैठक में अपनी बात दोहराते हुए कहा कि भारत हमेशा से म्याँमार का एक भरोसेमंद पड़ोसी विश्वसनीय भागीदार और संकट के समय सबसे पहले मदद पहुंचाने वाला मित्र (फर्स्ट रिस्पॉन्डर) रहा है।
यह नीति भारत के नेबरहुड फर्स्ट (पड़ोसी पहले) एक्ट ईस्ट और महासागर (MAHASAGAR) विजन के बिल्कुल अनुकूल है। पीएम मोदी ने म्याँमार में शांति और लोकतांत्रिक संवाद की बहाली के लिए भारत की तरफ से हरसंभव सहयोग की पेशकश की जिसमें संघीय शासन (फेडरल गवर्नेंस) और आर्थिक विकास के भारतीय अनुभवों को साझा करना भी शामिल है।
बता दें कि म्याँमार के राष्ट्रपति 30 मई से 2 जून तक भारत की चार दिवसीय आधिकारिक यात्रा पर हैं। इस सफल वार्ता के समापन पर उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी को म्याँमार आने का भावभीना निमंत्रण भी दिया।




